गुरुवार, 24 नवंबर, 2005 को 10:48 GMT तक के समाचार
राजीव खन्ना
बीबीसी संवाददाता, अहमदाबाद
आजकल नर्मदा बचाओ आंदोलन की 20वीं सालगिरह मनाई जा रही है.
महाराष्ट्र में धुलिया और गुजरात में बड़ौदा से आंदोलनकारियों के जत्थे निकल पड़े हैं जो सरदार सरोवर योजना के कारण विस्थापित लोगों को जोड़ते हुए आगे बढ़ रहे हैं.
इस कार्यक्रम का समापन 27 नवंबर को मध्य प्रदेश के बड़वानी में एक रैली के रुप में होगा.
यह वही आंदोलन है जिसने समाज को मजबूर किया कि वह स्वतंत्र भारत में विकास की परिभाषा पर दोबारा विचार करे.
इस मुहिम से जुड़े रोहित प्रजापति कहते हैं, "इस मुद्दे पर अख़बार, सरकार और हमने, सभी ने बहुत कुछ कहा है. हम चाहते हैं कि इस मौक़े पर लोग आज स्वयं आ कर देखें कि सही परिस्थितियाँ क्या है."
हालात
उनकी हालत का पता मुझे तब चला जब मैं दोबारा बसाए गए गाँव परवेथा में हुई एक सभा में पहुँचा.
सभा में आदिवासी समाज के लोग जो गीत सुना रहे थे, उनके बोल जंगल और ज़मीन पर उनके छिने गए हक़ की बात कह रहे थे.
आदिवासी लोगों का कहना है कि बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्हें पुनर्वास के बाद ज़मीन तो मिली पर यह ज़मीन उतनी उपजाऊ नहीं है जितनी की उनकी असली ज़मीन थी जो आज पानी के अंदर है.
उनकी यह भी शिकायत है कि ज़मीन उन्हीं बिख़रे हुए टुकड़ों में मिली है. बड़गाम से बेघर हुए शंकरभाई तदवी कहते हैं "वो कहते थे कि तुम्हें पानी के कमांड वाला एरिया देंगे. बताओ आज मेरी सिंचाई वाली ज़मीन कहाँ है. हम आवाज़ उठाते हैं तो हमारा दमन होता है."
रत्तीलाल जो गधेर गाँव से बेघर हुए थे, आज कहते हैं कि उन्हें ज़मीन अभी तक नहीं मिली.
उनका कहना है, "आज मैं पाँच आदमी का परिवार नदी किनारे ट्रकों में रेत भर कर कमाए हुए 20 रूपए दैनिक वेतन से पाल रहा हूँ. अगर आप सरकार तक भेजी मेरी अर्ज़ी की बात करते हैं तो गाँधीनगर में कम से कम 25 किलो कागज़ मिल जाएगी."
बहुत बड़ी तादाद में पुनर्वासित लोगों का कहना है कि आज नर्मदा की नहर उन्हें दी गई ज़मीन से निकल रही है पर उन्हें नर्मदा के पानी से वंचित रहना पड़ रहा है.
शांतिपूर्ण मुहिम
20 साल से इस आंदोलन का नेतृत्व कर रही मेधा पाटकर अभी भी लोगों को राह दिखा रही हैं.
मेधा कहती हैं कि आज नर्मदा घाटी के लोग, एक स्वतंत्र गणराज्य, जिसके वो नागरिक हैं, उसमें अपने मूलभूत अधिकारों की माँग कर रहे हैं.
सभाओं में अपने संबोधन में वो कह रही हैं कि यह आंदोलन एक शांतिपूर्वक चलाई गई मुहिम है और 20 साल से चल रही इस लड़ाई में लोगों के जज़्बे से आज सरकार भी डर रही है.
मेधा ने बीबीसी को बताया कि वैश्विकरण और बाज़ारी अर्थव्यवस्था के दौर में एक आम व्यक़्ति के लिए जनतांत्रिक जगह कम हो रही है.
वे कहती हैं, "पूँजी और बाज़ार का प्रभाव सरकार और समाज़ दोनों पर है. अब सोना गिरवी नहीं रखा जाता, बेच दिया जाता है."
उनका कहना है कि मौज़ूदा कार्यक्रम के दौरान इस बात पर भी चर्चा होगी कि आने वाले दिनों में जन आंदोलन का स्वरूप क्या होगा.
इस कार्यक्रम में भारत और दुनिया के भिन्न कोनों से आए लोग भाग ले रहे हैं.