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बुधवार, 23 नवंबर, 2005 को 17:11 GMT तक के समाचार

नीतीश कुमार के विचार

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विचारों से समाजवादी हैं और काफी सुलझे हुए नेता माने जाते हैं. आइए जानते हैं राजनीति के विभिन्न मुद्दों और विशेष कर बिहार के बारे में उनके क्या विचार हैं.

बिहार

बिहार के बारे में अवधारणा बन गई है, परसेप्शन हो गया है, इसको तो ठीक करना पड़ेगा. इसको ठीक किए बगैर कोई बिहार के तरफ नहीं झाँकेगा. सचमुच करिश्मा हो सकता है, बिहार में तो ऐसी संभावना है. इसमें चुंबकीय आकर्षण है यहाँ के वातावरण में सौंदर्य है.

विकास के हर पैमाने पर नीचे आ गए हैं उस हर पैमाने पर हमको उठाना होगा उसके लिए ज़रूरी है कि पहले हम आधारभूत ढाँचे को दुरूस्त करें, एक वातावरण बनाएं, निवेश का वातावरण बनाए. यहाँ जब निवेश होगा, कल कारखाने खुलेंगे तो रोज़गार के अवसर पैदा होंगे.

बिहार को कुछ चीजें तो तो विरासत में मिली है इसमें कोई शक नहीं है लेकिन 15 साल का समय बहुत बड़ा समय होता है. अगर यहाँ काँग्रेस की सरकार ने कुछ नहीं किया तो इसका मतलब ये तो नहीं है उसके बाद आने वाली सरकार कुछ न करे.

हमने शपथ ली है कि सबके साथ न्याय करेंगे अगर ये भाव मंत्र के तौर पर मैं कहता हूँ कि जिस समय सत्ता में बैठने के बाद लोगों को लग जाए कि हमें सबों के साथ न्याय करना है आप देखिएगा कि वातावरण में ऐसा परिवर्तन आएगा कि आज अकल्पनीय है लोगों को कल्पना नहीं होती, मुझको तो संभावना दिखती है.

राजनीति का अपराधीकरण

सुशासन हो तो सब चीज़ से छुटकारा मिल जाएगा, नहीं तो रोना रोते रहेंगे और स्थिति तो बहुत बुरी होती जा रही है. बहुत ही ख़तरनाक स्थिति है. सभी राजनीतिक दल के लोगों को और राजनेताओं को सोचना पड़ेगा कि हम एक दूसरे को पीछे करने के चक्कर में किनको आगे कर रहे हैं. कौन-कौन से तर्क गढ़ते चले जा रहे हैं.

नेताओं के प्रति घृणा पैदा हो रही है ये बात सही है, लेकिन उसके साथ-साथ आकर्षण भी है आप देखेंगे कि सबसे अधिक प्रभाव भी राजनीति करने वाले लोगों का होता है. दोनों ही बातें हैं एक बड़ा ही द्वंद्व जैसी स्थिति है इस समाज में दिखेगी. जिसके लिए जान देते हैं वोट देते हैं.

परिवारवाद

परिवारवाद जो लोग कर रहे हैं वे तो सबसे बड़े दुश्मन हैं सामाजिक न्याय के. उनको एहसास नहीं कि वे क्या कर रहे हैं. लोकतंत्र में परिवारवाद का कहाँ स्थान हो सकता है. लोकतंत्र में सबको आज़ादी है लोग ये तर्क देते हैं कि हमारे परिवार के लोगों को भी आज़ादी है, तो आज़ादी तो है. नदी में वे ख़ुद तैरना सीखें और इज्ज़त तो मिलती है. हम कह दें कि सब बराबर है यह तो एक मान्यता है.

लोकतंत्र

भारतीय समाज में एक गज़ब द्वंद्व है लेकिन ये लोकतंत्र का कमाल है और मुझको लगता है कि लोकतंत्र में इतनी जीवंतता है कि हमको ऐसा लगता है कि अब वो क्रिटिकल प्वाइंट पहुँच रहा है जहां उससे जनमत पैदा हो रहा है और उस जनमत के प्रभाव पर सभी राजनीतिक दलों को ये सोचना पड़ेगा मज़बूर होना पड़ेगा कि अभी तो आप कुछ भी कह लें, हम एक दूसरे पर आरोप लगा देंगे कि आपने किया इसलिए हम कर रहे हैं.

आरक्षण और सामाजिक बदलाव

आरक्षण के बाद उसमें विकृतियाँ आई, जो आप आरक्षण कहते हैं वह तो एक पक्ष है. बुनियादी चीज़ें है सामाजिक न्याय यानि समाज में जो वंचित रहे हैं अवसर से वंचित रहे हैं उनको अवसर दिलाना और बराबरी पर लाना और बराबरी पर लाने के लिए जो वंचित रहे हैं उनको विशेष अवसर देना और विशेष अवसर का एक अंग आरक्षण भी है तो एक आरक्षण की बात हुई.

अब सामाजिक न्याय का जो आंदोलन है वह जातीवाद के ख़िलाफ़ है क्योंकि सामाजिक अन्याय जातिप्रथा ने पैदा किया है. तो जब हम सामाजिक अन्याय की बात करते हैं तो जातिप्रथा के प्रतिकूल है तो जातिप्रथा को समाप्त होना चाहिए,

चीज़ें थोड़ी बदलीं लेकिन व्यवहार वही रह गया तो यह सामाजिक न्याय नहीं है. तो यह सामाजिक न्याय की मूल अवधारणा के प्रतिकूल है.

लालू के साथ दुराव

वह तो भटकाव उनका था. हमनें तो राजनीति की काँग्रेस के ख़िलाफ़. वे तो भटक गए और उस भटकाव में हम थोड़े ही साथी हो सकते थे इसलिए हमने अपना रास्ता स्वयं चुना.

अब सबसे बड़ा भटकाव हुआ सामाजिक न्याय के मुद्दे पर. जन नायक कर्पूरी ठाकुर जी जब मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने बिहार में बिहार सरकार की नौकरी में आरक्षण लागू की और उसमें पिछड़े वर्गों का वर्गीकरण किया गया.

पिछड़े वर्ग और अत्यंत पिछड़े वर्ग. यहाँ एक योजना चल रही थी कि पिछड़े वर्ग और अत्यंत पिछड़े वर्ग को मिला दिया जाए. यानी अत्यंत पिछड़े वर्ग को अलग से आरक्षण मिला हुआ है वह उससे वंचित हो जाते. मैंने इसका विरोध किया इसलिए वैसा हो नहीं सका. लेकिन मुझे लग गया कि सामाजिक न्याय के नाम पर ये जो कब्ज़ा वाली राजनीति चलने लगी इसलिए हमारे लिए एक दूरी का कारण तो ये है.

दूसरा दूरी का कारण बना सुशासन. काँग्रेस ने अच्छा सुशासन नहीं किया तो हम उसके स्थान पर आए हैं तो हमको तो सुशासन करके दिखलाना पड़ेगा. बेहतर सुशासन होना चाहिए.

नीतीश कुमार के साथ मणिकांत ठाकुर की विशेष बातचीत पर आधारित