मंगलवार, 22 नवंबर, 2005 को 15:57 GMT तक के समाचार
संतोष भारतीय
वरिष्ठ पत्रकार
बिहार में जनता जीती और शान से जीती. कोई भी अंदाज़ नहीं लगा पाया कि अंडरकरंट (अंतर्धारा) इतना शक्तिशाली होगा.
यह अंडरकरंट भी किसी दल के पक्ष या विपक्ष में नहीं बल्कि अपनी तकलीफों, दर्द, परेशानियों और टूटे सपनों के विरोध में था.
इस चुनाव में उन लोगों की भूमिका बहुत बड़ी थी जो पंद्रह साल पहले, जब लालू यादव ने सत्ता संभाली थी तो 15 वर्ष के थे.
उस समय उसने सपने देखे. वही सपने जो उसे लालू यादव ने दिखाए थे और उन्हीं सपनों को पूरा करने के लिए वह 10 वर्ष तक लालू यादव के लिए वोट बैंक भी बना रहा और बूथ का मैनेजर भी.
सन 2000 में उसकी आशा टूटनी शुरू हुई और लालू यादव को काँग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनानी पड़ी.
नासमझी
पर लालू यादव को यह संकेत समझ नहीं आया.
उन्होंने बिहार के विकास के लिए कुछ नहीं किया. सड़क, अस्पताल, बिजली, शिक्षा, संचार, रोज़गार जैसी चीज़ें बिहार के लिए सपना हो गई.
इन सारी चीज़ों का उपयोग ज़्यादातर वही वर्ग करता है जो लालू यादव का समर्थक वर्ग रहा है.
लालू यादव कहते हैं कि उन्होंने बहुत विकास किया, लेकिन उनके समर्थक वर्ग को तो यह दिखाई नहीं दिया, तब विकास किया किसके लिए?
वही किशोर जो 15 वर्ष का था जब लालू जी ने सत्ता संभाली थी, सपने देखे थे और लालू यादव को आदर्श पुरुष माना था, आज 2005 में वह 30 वर्ष का हो चुका है.
उसने इस दौरान सपनों को टूटते देखा, भूख पहले जितनी कष्टकर थी, अब उसे और नंगे रूप में देखा. लालू यादव के समर्थक वर्ग के इस नौज़वान ने इस बार विद्रोह कर दिया. इतना ख़ामोश विद्रोह कि कोई समझ ही नहीं पाया.
वोट बैंक
इस चुनाव में जिसमें लालू यादव बुरी तरह हारे हैं, एक बात और साबित हुई कि मुसलमान अब किसी की जागीर बनकर नहीं रहना चाहता.
वह न तो सांप्रदायिकता के नाम पर भुलावे में रहना चाहता है और न दंगों के डर से दुबकना चाहता है. उसने भी वही दर्द महसूस किया जो दूसरे ग़रीबों ने किया और उसने नीतिश कुमार को वोट दिया. ख़बर यहाँ तक है कि कुछ जगहों पर उसने भाजपा तक को वोट दिए. क्या यह ट्रेंड आगे बढ़ेगा?
पासवान की मुस्लिम मुख्यमंत्री की बात को, दलित-मुस्लिम गठजोड़ की बात को मुसलमान समाज ने पसंद किया पर वोट उसने कम दिए.
उसे लगा कि पासवान के साथ समाज का कोई और वर्ग तो खड़ा नहीं है इसलिए उन्हें लालू यादव का विकल्प मानना संभव नहीं है और इसलिए उसने 35 प्रतिशत नीतिश कुमार को, 35 प्रतिशत पासवान को और 30 प्रतिशत लालू यादव को वोट दिया.
इस बार मुसलमानों ने दिल्ली के मुस्लिम संगठनों के फ़तवों को नहीं सुना, ज़मीनी हकीकत को देखा और फ़ैसला लिया.
योग्य आयोग
चुनाव आयोग ने पहली बार ऐसी व्यवस्था की कि वोट डालने की इच्छा रखने वाला वोट डाल सके.
इस बार ऐसे लोगों ने भी वोट डाला जिन्होंने अब तक वोट डाला ही नहीं था और इसके लिए उन्होंने चुनाव आयोग को धन्यवाद दिया.
इतना ही नहीं, बहुत सी जगहों पर केजे राव के पैर छूकर लोगों ने अपनी भावनाएं व्यक्त की.
मशीनरी तभी काम करती है जब काम कराने वाला हो और बिहार में केजे राव ने मशीनरी से काम लिया और इतना लिया कि लोगों ने सत्ता ही बदल दी.
मील का पत्थर
बिहार का चुनाव देश के इतिहास में मील का पत्थर बनेगा.
यह जनादेश लालू यादव के लिए सीख और नीतिश कुमार के लिए चेतावनी का काम करेगा.
यह चुनाव आकाश पर साफ़ साफ़ लिख रहा है कि अब यदि आप आम जनता के भले के लिए काम नहीं करते तो अब आप आम जनता के नेता नहीं बने रह सकते.
यह ट्रेंड बिहार में रुकेगा नहीं, यह और प्रदेशों में भी बढ़ेगा तथा केंद्र की सरकार को भी चेताता रहेगा.