मंगलवार, 15 नवंबर, 2005 को 12:37 GMT तक के समाचार
श्याम सुंदर
सिवान से
एक्ज़िट पोल यानी मतदान के बाद के चुनाव सर्वेक्षणों के आधार पर बिहार चुनाव को लेकर जितनी भविष्यवाणियाँ कर दी गई हों, उन्हें लेकर मेरे मन में शंका बनी रहेगी.
इसका कारण भी है कि तीसरे चरण के मतदान के दौरान सैकड़ों मतदाताओं के मन की थाह पाने की कोशिश मैंने की, पर नाकाम रहा.
एक नौजवान मतदाता अमित ने बदलाव, जातिवाद और दूसरे मुद्दों पर हमसे लंबी बात की, पर जब हमने उनसे पूछा कि आप किस मुद्दे पर वोट देना चाहेंगे तो उन्होंने तपाक से कहा, "तब आप समझ ना लेंगे कि हम किसको वोट दिए हैं."
एक बुज़ुर्ग रामस्वरूप राम, जो दो घंटे से लाइन में लगे थे, क़ाफी गुस्से में थे. हमें उन्होंने सुरक्षा व्यवस्था पर ढेर सारी बातें बताईं, पर जब पूछा दादा कौन जीत रहा तो बोले, "आप ही बताओ."
एनडीए का बदलाव का नारा और छह महीने में फिर से चुनाव होने के लिए यूपीए को ज़िम्मेदार ठहराने की उसकी कोशिश कुछ इलाकों में, ख़ासतौर से शहरी क्षेत्रों में असरदार तो दिखाई देती है, पर लगता है कि जातीय समीकरण ही इस बार भी चुनाव परिणाम में निर्णायक भूमिका निभाएंगे.
ये बात मतदाताओं और उम्मीदवारों से बातचीत में साफ़ नज़र आ रही है.
दरभंगा ग्रामीण विधानसभा क्षेत्र के नौजवान मतदाताओं ने बदलाव पर ज़ोर देते हुए कहा ‘नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बन रहे हैं.’ मैंने पूछा सच बताइए क्या ख़ास है नीतीश कुमार में, तो उन सबने एक सुर में कहा ‘एक बार हमारी जाति का भी नंबर आना चाहिए.’ ये सभी छात्र थे.
लालू का छपरा
चौथे चरण का चुनाव प्रचार देखने हम छपरा पहुँचे. ये क्षेत्र रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव का संसदीय क्षेत्र है, पर छपरा शहर में हवा उनके पक्ष में नहीं है.
पेशे से वकील अनिल दुबे कहते हैं, "आप जिस सड़क से आए हैं उसका हाल देखकर भी कोई कह सकता है कि लालू प्रसाद यादव की पार्टी को लोग वोट देगा?"
लेकिन जब कुछ ग्रामीण इलाक़े में गए तो चंद्रभान यादव मिले जिन्होंने कहा, "कौन कहता है काम नहीं हुआ है, हम आरजेडी को ही वोट देंगे."
इस क्षेत्र के जातीय समीकरण आरजेडी के पक्ष में नहीं हैं, हालांकि परिस्थिति अभी भी बहुत कठिन नहीं दिखती.
चुनाव के हीरो
छह महीने के बाद ही चुनाव से लोग दुखी तो हैं, लेकिन फिर भी पूरी तरह से उदासीन नहीं हुए हैं.
मतदान का औसत बेशक कम हुआ हो पर चुनावी मुद्दों या पार्टियों पर चर्चा में वहाँ के लोग ख़ूब रस लेते हैं.
इस पूरे चुनाव के माहौल में एक नाम सभी की ज़ुबान पर है, केजे राव का. चुनाव आयोग के इस विशेष सलाहकार की ख़ूब प्रशंसा भी हो रही है.
पर कहीं कहीं सुरक्षाबलों के अनावश्यक हस्तक्षेप से मतदाता परेशान भी नज़र आए. तीसरे चरण में तो कई जगहों पर मतदान की गति इतनी धीमी चली कि कई मतदाता वापस लौट गए.
लोगों ने जो कुछ बताया जिसमें केजे राव के कई फ़ैसले अव्यवहारिक भी नज़र आए, मसलन एक मतदाता द्वारा सूची से नाम कटने की शिकायत पर वो दौड़े-दौड़े दरभंगा पहुँचे और ज़िला प्रशासन को भी वहाँ बुलाया, पर बाद में पाया गया कि उस मतदाता का नाम सूची से कटा नहीं था.
जो भी हो, फ़िलहाल तो केजे राव यहाँ हीरो बने हुए हैं.
कुल मिलाकर अभी जो तस्वीर हम बिहार में देख पा रहे हैं लगता नहीं की परिणाम बहुत अलग होने वाले हैं और स्थिति फिर वही ढाक के तीन पात.