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शनिवार, 12 नवंबर, 2005 को 09:31 GMT तक के समाचार

ढाका से रेणु अगाल
बीबीसी संवाददाता

छावनी में तब्दील हुआ ढाका

दक्षिण एशियाई देशों के शिखर सम्मेलन में बांग्लादेश की राजधानी ढाका को एक छावनी में तब्दील कर दिया गया है.

ज़िया अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से लेकर बांग्लादेश-चाइना फ़्रेंडशिप कांफ़्रेंस सेंटर और होटल शेरटन के रास्ते पर अगर आपको कोई नज़र आएगा तो वे बंदूकधारी सुरक्षाकर्मी होंगे.

सार्क सम्मेलन की तस्वीरें

सन् 2003 में जब मैं इस रास्ते से इसी इलाक़े से गुज़री थी तो ऑटोरिक्शा का धुँआ और बांग्लादेश के ट्रेडमार्कवाले साइकिल रिक्शों की घंटियों की गूँजती थीं.

आज कहाँ गए वे रिक्शे और उनके चालक.

आम बनाम ख़ास

दिनभर एक के बाद एक विशिष्ट अतिथियों के स्वागत में लोगों की आवाजाही रुकती रही. आवाज़ें सुनाई भी दीं तो पुलिस सायरनों और हेलीकॉप्टरों की.

जब ठप पड़े यातायात में घर जाने के लिए आतुर लोगों से मिलने पहुँचीं तो उनका समय चने चबाने में लगा हुआ था.

लोग कह रहे थे कि बड़े लोग आए हैं इसलिए यह सब हो रहा है.

ढाका में सम्मेलन की तैयारियाँ?

एक छात्र में हमसे कहा, "11 सितंबर के बाद बदल गई दुनिया में आतंकवाद समस्या बन गया है इसलिए हमें इतनी तकलीफ़ तो झेलनी ही पड़ेगी."

ढाका को तीन दिनों के लिए क्षेत्रीय सहयोग की ख़ातिर बंद रहना पड़ रहा है पर रोज़ कमाने-खानेवालों के लिए ये मार भारी पड़ रही है.

उनकी ख़ातिर हम आशा ही कर सकते हैं कि सार्क देश उनके जीवन को बेहतर बनाने के लिए कुछ करें. पर कहीं ग़रीबी हटाने के बजाय ग़रीबों को न हटा दें.

चमक-दमक

जनाब, न ईद है और न दीवाली पर ढाकावासियों से पूछिए तो वे कहेंगे कि जैसी सजावट आज आप देख रहे हैं, ढाका में इससे पहले कभी नहीं हुई.

शिखर बैठक के आयोजन स्थल के पास ही सार्क फ़व्वारा है जो कि सार्क की स्थापना पर बनाया गया था.

मज़ाक में लोग यह भी कहते हैं कि सार्क ने शायद कुछ भी हासिल नहीं किया है, इस फ़व्वारे के अलावा.

यहीं पर हमें ऐश्वर्या रॉय नज़र आईं, सचमुच की नहीं, होर्डिंग से झांकती हुई. 21 साल के अल्हड़ सार्क से उम्मीदें अब भी बहुत हैं.

बांग्लादेश ने दो बार स्थगित हुए इस सम्मेलन को सफ़ल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है.

अब अगली बैठक दिल्ली में होगी पर कैसा होगा इस क्षेत्रीय समूह का भविष्य, यह देखने लायक बात होगी.

सुर्ख़ियों में

सार्क की एक सच्चाई यह भी रहे हैं कि इसके दो बड़े देश, भारत और पाकिस्तान इस पर हावी रहे हैं.

हर बार बाकी देशों के प्रतिनिधि कहते हैं कि हमें कोई नहीं पूछता है पर इस बार शायद ऐसा न हो.

पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ यहाँ नहीं हैं तो भारत- पाकिस्तान पर किसी का ध्यान नहीं है.

यहाँ चर्चा हो रही है नेपाल की जहाँ प्रजातंत्र की वापसी पर प्रश्नचिन्ह लगा है.

बात यह भी हो रही है कि भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, महाराजा ज्ञानेंद्र को क्या संदेश देंगे.

चर्चा भारत-बांग्लादेश रिश्तों की भी है. टीकाकार बांग्लादेश में बढ़ रहे कट्टरपंथीगुटों को चिंता का विषय बताते हैं.

भारत भी चिंतित है कि देश में चरमपंथी गतिविधियों के तार कहीं बांग्लादेश से तो नहीं जुड़े हैं.