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मंगलवार, 08 नवंबर, 2005 को 11:49 GMT तक के समाचार

सलामाबाद से श्याम सुंदर

लोगों को एक आशियाने की तलाश

भारतीय राज्य जम्मू कश्मीर के भूकंप पीड़ित सदमे से बाहर आकर ज़िंदगी के बिखरे टुकड़ों को चुनने में लगे हैं.

हालाँकि ज़्यादातर लोगों को शिकायत है कि उन्हें राज्य सरकार की तरफ से अब भी पर्याप्त सहायता नहीं मिल रही है.

लगातार गिरते तापमान को देखकर लोग अपने गिरे हुए मकानों का मलबा हटाकर परिवार के लिए छत का इंतज़ाम करने में जुट गए हैं.

नियंत्रण रेखा के पास सलामाबाद में अपना घर फिर से बनाने में जुटे अब्दुल मज़ीद कहते हैं,''सरकार की तरफ से एक लाख रुपए की घोषणा हुई है, लेकिन सिर्फ़ 40 हज़ार का चेक हमें मिला है, पर जो भी हो बर्फ पड़ने से पहले सिर पर छत का इंतज़ाम तो करना ही है.''

यहीं सलामाबाद का स्कूल भी पूरी तरह से तबाह हो गया था. पर जम्मू-कश्मीर पुलिस की तरफ़ से टिन शेड का इंतज़ाम कर दिया गया जिसमें अब ये स्कूल चल रहा है.

स्कूल के इंचार्ज रिज़वान ने बताया कि जिस समय भूकंप आया तो ज़्यादातर बच्चे बाहर खेल रहे थे तो कम से कम सबकी जान बच गई.

बच्चों पर असर

पर बच्चों के नन्हे दिमाग़ पर इस त्रासदी का गहरा असर आया है इसलिए अभी इन बच्चों को पढ़ाने की बजाए उन्हें खेलने में लगाया जा रहा है ताकि ये बच्चे उस हादसे को भूला सकें.

इसी प्राइमरी स्कूल में पढ़ने वाले पाँच साल के मुनीर महीने भार पहले के हादसे को याद करते हुए कहते हैं,‘मैं गेट पकड़ कर खड़ा था, वो ज़ोर से हिलने लगा. मैं भागा. किसी ने कहा अंदर जाओं.मेरी माँ ने कहा नहीं बाहर भागो और मैं बाहर भागा.’

मुनीर अब ख़ुश है क्योंकि उनके परिवार के रहने के लिए अब शेड बन गया है और उसने भी बाक़ायदा हाथ बँटाया था, इस शेड के बनने में.

प्रशासन की तरफ से भूकंप पीड़ितों को 11 किलो चावल और सात सौ ग्राम चीनी प्रति व्यक्ति दी जाती हैं, पर इस राहत सामग्री के वितरण में नियमित नहीं है.

पर खाने के सामान से ज़्यादा जिस बात को लेकर ये लोग चिंतित हैं वो है यहाँ अभी भी ज़्यादातर मकान टूटे पड़े हैं और टेंटों की भारी कमी है.

उड़ी में भी कुछ ऐसे ही हालात देखने को मिलते हैं. यहाँ कई-कई परिवार एक ही टेंट में रहने को मज़बूर हैं.

ज़्यादातर परिवारों ने महिलाओं और बच्चों को अपने रिश्तेदारों के यहाँ भेज दिया है.

एक टेंट में रह रहे कई परिवारों की हालत बताते हुए इरशाद ने बताया,‘क्या करें, रात को सोते हुए भी डर लगता है, मोटे-मोटे चूहे आपके आस-पास घूमते रहते हैं. खाने का सामान भी बिगाड़ देते हैं.’

ये परिवार रात किसी तरह इन अस्थाई शेड में गुज़ारते हैं और दिन भर घर के बचे मलबे में बचा-खुचा तलाशते हैं.

कुल मिलाकर भूकंप के महीने भर बाद भी लोग जहाँ सरकारी मदद की उम्मीद नहीं छोड़ रहे हैं, वहीं अपने दम अपना आशियाना बनाने में भी लगे हैं.