मंगलवार, 08 नवंबर, 2005 को 10:53 GMT तक के समाचार
उड़ी से सीमा चिश्ती
संपादक, बीबीसी दिल्ली
भारतीय राज्य जम्मू कश्मीर में राहत के काम में लगी ग़ैरसरकारी संस्थानों का कहना है कि जिस प्रकार से आपदा को देखा जाता है, उसमें बुनियादी परिवर्तन की ज़रूरत है.
एक्शन एड के कश्मीर में प्रोजेक्ट मैनेजर अरजिमिंद हुसैन का कहना है, '' अगर 30 नवंबर तक यहाँ लोगों के सर पर एक मज़बूत और बर्फ से बच सकने वाली छत का प्रबंध नहीं किया गया, तो अब एक नए सिरे से मौतों का सिलसिला शुरू हो जाएगा.''
सुदीप्ता दिल्ली से यहाँ आई हैं और उनका कहना है,''‘ मरे हुए लोगों की संख्या के आधार पर आपदा की गंभीरता तय करना ग़लत है. देखना यह चाहिए कि जो लोग बच गए हैं, उनका क्या हाल है. उनकी स्थिति के आधार पर तय करना चाहिए कि आपदा किस प्रकार की है. ''
यहाँ नियंत्रण रेखा से लगे गाँवों में पहाड़ों से घिरे निवासियों को आज से एक महीने पहले लगा कि पहाड़ों में ‘उबाल आ गया है’. तब से लेकर अब तक इनकी ज़िदगी पूरी तरह बदल गई है.
हसीना परवीन का सलामाबाद में आलीशान घर था. लेकिन अब वो अपने आप को बेघर मानती हैं. ‘हमने अपने आप यह शेड तैयार किया. बच्चों तक ने एक-एक मुट्ठी मिट्टी दी, ताकी ज़ल्दी से ठंड से बचा जा सके.’
चार हफ़्ते तो बीत गई. अब यहां किन चीज़ों की ज़रूरत है? इसमें दो राय नहीं है कि सबसे पहली ज़रूरत है, सर पर महफूज़ छत, जो ठंडे मौसम से बचा सके.
प्राथमिकता की ज़रूरत
यही प्राथमिकताओं की सूची बनाई जाए तो उसमें से एक से दस तक ज़रूरत है छत. शिविर या टेंट भी अपर्याप्त साबित हुए हैं. अब टीन की छतों को तैयार किया जाना ज़रूरी है.
आबिदा का कहना है कि छोटी-छोटी चीज़ें ज़िंदगी और मौत के बीच खड़ी हैं. ‘छोटी चीज़े, जैसे बच्चों के लिए जूते.’ इन्हें प्राथमिकता में लाना ज़रूरी है.
सादिक़ अली उड़ी शहर से थोड़ी दूर के गाँव के रहने वाले हैं और कहते हैं, '' यहाँ अब लोग ज़्यादा परेशान हैं, कभी टूटे घर में जा के सामान निकालते हैं, कभी रख देते हैं. प्यास लगे तो कुछ खा लेते हैं. भूकंप ने सब कुछ उलट-पुलट कर दिया है.''
मानसिक स्तर पर सुकून की भी यहाँ ज़रूरत है और मकान की भी. यह सभी चीज़ें निचले स्तर तक तभी मुहैया की जा सकेगी, यदि सरकार और ग़ैरसरकारी संगठन दोनों मिल के काम करें.
सभी ग़ैरसरकारी संगठन कम से कम हर शनिवार को अपने एक-एक प्रतिनिधि की बैठक करवा रहे हैं जिससे कि जानकारी बाँटी जा सके.
बहरहाल, ऐसा भी नहीं है कि यहाँ लोग बेबस हैं. शागुफ़्ता एक प्राइमरी स्कूल शिक्षक हैं और फिलहाल कपड़े धोने, पानी भरने से लेकर बच्चों को बहलाने में व्यस्त हैं.
उनका कहना है, '' शुरु-शुरु में बच्चे रोते थे कि हमारा घर कहाँ गया. यहाँ कैसे सो पाएँगे, हमारा कमरा कहाँ है ? अब, हम सब नई ज़िंदगी के आदी हो गए हैं. सीधे दसवीं सदी में पहुंच गए हैं, लेकिन हिम्मत नहीं हारी है. इंशा अल्लाह, सब कुछ संभल जाएगा. ''