http://www.bbcchindi.com

बुधवार, 02 नवंबर, 2005 को 16:32 GMT तक के समाचार

घनश्याम पंकज
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक

बिहार पर छाई राजनीतिक धुंध

बिहार पर अजीब तरह की राजनीतिक धुंध छाई हुई है. एक वर्ष के भीतर ही हो रहे दूसरे विधानसभाई चुनावों का दूसरा दौर पूरा हो चुका है मगर युद्धरत राजनीतिक दलों के योद्धाओं की 'बॉडी लैंग्वेज' ज़ाहिरा तौर पर बेचारगी और किंकर्तव्यविमूढ़ता का ही अहसास करा रही है.

चार चरणों में हो रहे चुनाव का तीसरा दौर तो 13 नवंबर को होना तय है पर अबतक के दोनों शुरुआती दौरों में मतदान का अंदाज़ एक जैसा रहा है.

दोनों बार चुनाव आयोग ने कठोरता से अपना दायित्व निभाया. बूथ कब्ज़े की वारदातें भी न के बराबर रहीं.

औसतन लगभग 40 से 45 प्रतिशत मतदाता स्त्री-पुरुष मतदान केंद्रों तक गए और उन्होंने बाहुबलियों और अपराधी तत्वों की परवाह किए बग़ैर वोट डाले.

यह सब पिछले दो दशकों के बिहार के चुनावी माहौल को चुनौती देने की तरह रहा.

जो चुनाव राज्य में मतपत्रों की लूट, मतदान केंद्रों पर कब्ज़े, बाहुबलियों की तनी हुई बंदूकों के साये तले ही होते रहे हैं, वे अगर आज शांतिपूर्ण वातावरण में और निर्भय मतदाताओं की इच्छानुसार हुए तो यह अपनेआप में एक उल्लेखनीय उपलब्धि ही मानी जाएगी.

जैसे ये दो दौर बीते हैं, वैसे ही दूसरे दो दौर भी बीत जाएं तो इस बार का चुनाव आगे भी बतौर मिसाल काम आएगा.

पत्ते पर सत्ता

वैसे तो मतदाता अपने पत्ते आसानी से नहीं खोलता पर अपने वोट गिरा लेने के बाद और मतदान केंद्र से निकलने के बाद थोड़ कम सतर्क और ज़रा-बहुत मुखर हो जाता है.

एक्ज़िट पोल में मतदाताओं को अपना मन खोलते हुए देखा गया है. इसीलिए दुनिया की तमाम लोकशाहियों में चुनाव पूर्वानुमानों के कारगर नहीं होने की स्थिति में भी एक्ज़िट पोल अमूमन सटीक बैठे हैं.

बिहार में दोनों दौरों के एक्ज़िट पोल खंडित जनादेश का इशारा तो देते ही हैं मगर इससे भी आगे वे निर्दल या स्वतंत्र प्रत्याशियों के बड़ी संख्या में चुनकर विधानसभा में जाने की भविष्यवाणी भी कर रहे हैं.

ये निर्दलीय और स्वतंत्र विधायक ही किसी भी दल या दल समूह को स्पष्ट जनादेश नहीं मिलने की स्थिति में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.

ख़रीद-फ़रोख्त और सिद्धांतहीन गठबंधनों के सिर्फ़ सत्ता की ख़ातिर एकजुट होने में इनकी मदद की दरकार बड़े राजनीतिक दलों को भी होती है.

लगाम किसके हाथ

एक्ज़िट पोल के संकेत हैं कि इस बार स्वतंत्र विधायकों का अच्छी-ख़ासी तादाद में विधानसभा में पहुँचना तय है और चुनाव सर्वेक्षणों में भी यही बात कही गई है कि लगभग 35-40 ऐसे निर्दलीय और स्वतंत्र विधायकों के चुने जाने की संभावना है जिनपर किसी तरह का राजनीतिक अनुशासन नहीं होता.

आमतौर पर ये विधायक या तो कोई बाहुबली या उनके जेल के सीखचों के भीतर होने की स्थिति में उनकी पत्नी या कोई अन्य रिश्तेदार होते हैं अथवा ये उन राजनीतिक दलों के बग़ावती होते हैं, जिसने इन्हें किसी कारणवश टिकट नहीं दिया और कभी गुस्से में तो यदाकदा तो सचमुच ये अपने पर हुए ऐसे अन्याय के प्रतिकार के लिए चुनावी मैदान में उतर आते हैं.

ऐसा देखा गया है कि राजनीतिक दलों के ये बाग़ी जब सरकार बनाने-बिगाड़ने जैसा निर्णायक क्षण आता है तो अपनी पूरी क़ीमत वसूल लेते हैं.

मंत्रीपद का भरोसा और मलाईदार विभाग आदि इनकी माँगों में शामिल रहते हैं. रंग बदलने में इन्हें न कोई शील है और न संकोच.

वजह साफ़ है कि इन निर्दलीय और स्वतंत्र विधायकों के बड़ी संख्या में चुनकर आने की आशंका राजनीतिक अस्थिरता के माहौल को बढ़ावा देती है और जनादेश को मखौल में बदल सकती है.

तीसरे और चौथे दौर के मतदान की तारीखें 13 और 19 नवंबर हैं और जो लोग इस चुनाव से स्थिरता, स्पष्ट जनादेश और ठोस राजनीतिक सांत्वना चाहते हैं, उनकी यही अपेक्षा है कि इन निर्दलीय और स्वतंत्र प्रत्याशियों को खुलकर खेलने का मौका न मिले.

बावजूद इसके कि पहले दोनों दौरों से अनिश्चय का धुंधलका छटा नहीं है और आशा भी छिनी नहीं है कि शेष दो दौरों का मतदान कोई दो-टूक जनादेश देगा.

(लेखक 'दिनमान' और 'स्वतंत्र भारत' के पूर्व मुख्य संपादक हैं.)