शनिवार, 22 अक्तूबर, 2005 को 15:09 GMT तक के समाचार
असम में पिछले एक हफ़्ते में हुई जनजातीय हिंसा में कारबी और दिमासा जनजाति के बीस हज़ार से ज़्यादा लोग विस्थापित हो चुके हैं.
राज्य सरकार का कहना है कि करीब 90 लोग मारे जा चुके हैं जिसमें कार्बी जनजाति के नौ विद्रोही भी शामिल हैं.
मरने वालों में ज़्यादातर बच्चे, महिलाएँ और बूढ़े लोग शामिल हैं.
असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने कहा है कि इन हमलों के पीछे मार्क्सवादी-लेनिनवादी रेड आर्मी का हाथ हो सकता है.
मुख्यमंत्री ने कार्बी-आंगलौंग के सांसद जयंत रोंगपी पर हिंसा भड़काने का आरोप लगाया है.
लेकिन जयंत रोंगपी ने आरोप का खंडन करते हुए कहा है कि सरकार अपनी विफलता को छिपाने की कोशिश कर रही है.
जबकि असम के पूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल कुमार महंत ने कहा है कि राज्य सरकार को सत्ता में बने रहने का कोई हक़ नहीं है.
हिंसा
अब तक जनजातीय हिंसा कार्बी-आंगलौंग ज़िले में ही सीमित रही है. लेकिन खुफ़िया अधिकारियों को डर है कि अगर इसे रोका नहीं गया तो हिंसा दूसरे ज़िलों में भी फैल सकती है.
बारिश और हमला होने की आशंका बने रहने के चलते हालात और ख़राब हो गए हैं.
पुलिसकर्मियों और अर्धसैनिक बलों की कमी के चलते राहत शिविरों को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान नहीं की जा रही.
असुरक्षा और कर्फ़्यू के चलते गाँवों में स्थानीय बाज़ार बंद हो गए हैं जिसके चलते खाने की कमी हो गई है.
एशियन सेंटर फॉर ह्मूमन राइट्स की निदेशक सुहास चकमा का कहना है कि लोगों को खाने, पानी, दवा और सुरक्षा की सख़्त ज़रूरत है.
असम पुलिस ने गाँवों में हुई हिंसा और आगजनी के लिए कार्बी और दिमासा समुदाय के विद्रोही गुटों को दोषी ठहराया है.
दोनों विद्रोही संगठनों के प्रमुख गुटों ने भारत सरकार के साथ संघर्षविराम पर हस्ताक्षर किए हैं लेकिन ये लोग बेरोकटोक अपने हथियार लेकर घूमते हैं.
गृह मंत्रालय में पूर्वोत्तर मामलों के संयुक्त सचिव राजीव अग्रवाल ने कहा है कि अगर ज़रूरत पड़ी तो दोनों गुटों के लोगों से हथियार वापस लिए जाएँगे.