बुधवार, 12 अक्तूबर, 2005 को 01:58 GMT तक के समाचार
भारत प्रशासित कश्मीर में विपक्षी नेता नेशनल कॉन्फ्रेंस के फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने राज्य सरकार पर आरोप लगाया है कि उसने भूकंप पीड़ितों को सहायता पहुँचाने में कोताही बरती.
फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने बीबीसी के साथ एक बातचीत में कहा कि "अगर फौज नहीं होती तो और भी बहुत सारे लोग मर गए होते, राज्य सरकार पूरी तरह से नाकाम रही है लोगों की मदद करने में."
अब्दुल्ला का कहना है कि "सेना ने स्थानीय लोगों की बहुत मदद की है जिसके लिए लोग उनके बहुत शुक्रगुज़ार हैं."
लेकिन इसके जवाब में जम्मू कश्मीर की सत्ताधारी पार्टी की नेता महबूबा मुफ़्ती कहती हैं कि "सिर्फ़ सेना नहीं बल्कि स्थानीय प्रशासन ने बहुत सक्रियता दिखाई है, केंद्र सरकार ने भी उदारता बरती है, इंशा अल्लाह, हम जल्दी ही हालात ठीक कर लेंगे."
महबूबा मुफ़्ती ने लोगों की शिकायतों के बारे में पूछे जाने पर कहा, "लोग तबाह हो गए हैं, उनके रिश्तेदार मारे गए हैं, मकान ढह गए हैं, उनका ग़ुस्सा जायज़ है, इतनी बड़ी आपदा है कि जितनी भी सहायता दी जाए लोगों को कम ही लगेगी."
दूसरी ओर, प्रमुख अलगाववादी नेता मीर वाइज़ उमर फ़ारूक़ का कहना है कि वे 'भारत के ग़ैर-सरकारी संगठनों और औद्योगिक घरानों की बेरूख़ी' से बहुत दुखी हैं.
उनका कहना है कि गुजरात में भुज और उसके पहले महाराष्ट्र में लातूर में आए भूकंप के समय इन संगठनों ने जितना काम किया था, उस तरह का कोई काम कश्मीर में नहीं कर रहा है.
यात्रा का असर
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनके पहले सत्ताधारी गठबंधन यूपीए की अध्यक्ष सोनिया गाँधी की यात्राओं से राहत के काम पर सकारात्मक असर पड़ा है.
श्रीनगर से बीबीसी संवाददाता संजीव श्रीवास्तव का कहना है कि प्रधानमंत्री के पहुँचने पर राहत कार्यों में कुछ तेज़ी दिखाई दी है, ख़ास तौर पर नागरिक प्रशासन अधिक मुस्तैद हुआ है.
संजीव श्रीवास्तव का कहना है कि प्रधानमंत्री की इस यात्रा से स्पष्ट संदेश देने की कोशिश की गई है कि केंद्र सरकार कश्मीर की स्थिति को लेकर वाक़ई चिंतित है.
बुधवार को श्रीनगर से एक विशेष बस चलने वाली है जिसमें उन 40 लोगों को ले जाया जाएगा जो पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की राजधानी मुज़फ़्फ़राबाद से आए थे.
भूकंप की वजह से सड़क बंद है इसलिए इन लोगों को जम्मू से वाघा सीमा तक ले जाया जाएगा, जहाँ से वे पाकिस्तान में प्रवेश करेंगे.