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बुधवार, 05 अक्तूबर, 2005 को 07:20 GMT तक के समाचार

एएमयू में मुसलमानों को आरक्षण नहीं

मंगलवार को देर से आए इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले ने एक विवाद खड़ा कर दिया है.

इस फ़ैसले में न्यायालय ने कहा है कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) अल्पसंख्यक विश्वविद्यालय नहीं है और वह मुसलमानों को आरक्षण नहीं दे सकता.

उधर एएमयू ने कहा है कि वह इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ सर्वोच्च न्यायालय में अपील करेगा.

केंद्र सरकार ने 25 फ़रवरी को एक अधिसूचना जारी करके एएमयू में मुसलमानों को 50 फ़ीसदी आरक्षण देने का फ़ैसला किया था.

केंद्र सरकार की इसी अधिसूचना के ख़िलाफ़ मलय शुक्ला ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी.

इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अरुण टंडन ने अपने फ़ैसले में केंद्र सरकार के 1981 के संशोधन अधिनियम को भी रद्द करते हुए कहा है कि यह संविधान की भावना के अनुरुप नहीं है.

हाईकोर्ट ने 50 फ़ीसदी सीटें मुसलमानों के लिए आरक्षित करने के फ़ैसले के ख़िलाफ़ कहा है एक केंद्रीय विश्वविद्यालय में धर्म के आधार पर प्रवेश नहीं दिया जा सकता.

विवाद

उल्लेखनीय है कि यह मामला पहले भी अदालत में आया था. अज़ीज़ बाशा का यह मामला 1968 में सर्वोच्च न्यायालय तक भी पहुँचा था.

तब सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फ़ैसले में कहा था कि विश्वविद्यालय केंद्रीय विधायिका द्वारा स्थापित किया गया है और इसे अल्पसंख्यक विश्वविद्यालय का दर्जा नहीं दिया जा सकता लिहाज़ा यहाँ धर्म के आधार पर आरक्षण भी नहीं दिया जा सकता.

लेकिन सरकार ने इस फ़ैसले को प्रभावहीन करने के लिए 1981 में संविधान संशोधन विधेयक लाकर एएमयू को मुस्लिम यूनिवर्सिटी का दर्जा दे दिया था.

लेकिन यह मामला यूँ ही चलता रहा लेकिन जब केंद्र सरकार ने 50 फ़ीसदी सीटें मुसलमानों के लिए आरक्षित करने की माँग की तो इसका विरोध शुरु हुआ.

हाईकोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा है कि सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले को पलटने के लिए सरकार संविधान में संशोधन नहीं कर सकती और वह केवल क़ानून की कमियों को दूर कर सकती है.

माँग

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने हाईकोर्ट के इस फ़ैसले का विरोध करते हुए कहा है कि सरकार को अल्पसंख्यकों की हित रक्षा के लिए आवश्यक क़दम उठाया जाना चाहिए.

आयोग के अध्यक्ष तरलोचन सिंह ने कहा है कि यह आम धारणा है कि एएमयू एक मुस्लिम विश्वविद्यालय है और इस धारणा को ख़त्म करना आसान नहीं हैं.