गुरुवार, 06 अक्तूबर, 2005 को 13:47 GMT तक के समाचार
काबुल से लौटकर विनोद वर्मा
बीबीसी संवाददाता
किशन सिंह अपना पूरा नाम लिखते हैं डिप्लोमा इंजीनियर किशन सिंह हुनरयार.
ज़ाहिर है वे पेशे से इंजीनियर हैं लेकिन इस समय वे अफ़ग़ानिस्तान के अंतरराष्ट्रीय चुनाव आयोग के सदस्य हैं.
उनकी एक बेटी अनारकली जो पेशे से डॉक्टर हैं, इस समय मानवाधिकार आयोग में काम करती हैं और दूसरी दलजीत कौर बेटी अफ़ग़ानिस्तान के चेम्बर ऑफ़ कॉमर्स में हैं. तीसरी बेटी अभी डॉक्टरी की पढ़ाई कर रही है.
दो बेटे हैं. एक बेटा मॉस्को में व्यवसाय करता है तो दूसरा स्कूल में है.
कुल मिलाकर एक अच्छा ख़ासा प्रतिष्ठित परिवार है. ख़ासकर अफ़ग़ानिस्तान में रहने वाले हिंदू-सिख समुदाय के बीच.
लेकिन किशन सिंह हुनरयार के परिवार को एक अपवाद ही है क्योंकि ज़्यादातर हिंदू-सिख परिवार की हालत ऐसी नहीं है.
अभी भी हिंदू-सिख परिवार अफ़ग़ानिस्तान दिनों की तरह रह रहें हैं और अभी भी उनकी सामाजिक हैसियत ज़्यादा नहीं बदली है.
शिकायतें
कहने को वे हिंदू-सिख समुदाय के हैं लेकिन वे अपने आपको भारत से जोड़कर हरगिज़ नहीं देखते. भले ही वे पंजाबी बोलते हैं.
वे अपने आपको अफ़ग़ान कहते हैं और मानते हैं कि वही उनका देश है. शायद इसीलिए वे पंजाबी की तरह ही अधिकार के साथ पश्तो और दरी भी बोलते हैं.
और अब इस समुदाय को शिकायत है कि अफ़गानिस्तान में उनके साथ न्याय नहीं हो रहा है.
उनकी कहना है कि न तो अल्पसंख्यक होने के नाते उनके लिए संसद की सीट आरक्षित की गई हैं न उनको कोई सामाजिक पहचान मिल रही है.
वे तालेबान शासन काल में बहुत तक़लीफ़ में रहे हैं और काबुल का गुरुद्वारा इसका गवाह है. लेकिन अब जबकि सब कुछ ठीक है वे भी कुछ अच्छे की उम्मीद कर रहे हैं.
हिंदू-सिख समुदाय के प्रतिनिधि रवीन्दर सिंह ने गुरुद्वारे में बीबीसी से हुई बातचीत में कहा, “अब जबकि अफ़ग़ानिस्तान में तालेबान सरकार हट गई है और लोया जिरगा ने संविधान बनाया है तो भी इस समुदाय की अनदेखी कर दी गई है.”
रवीन्दर सिंह कहते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में जिस तरह कोची समुदाय के लिए संसद में दस सीटें आरक्षित की गई हैं उसी तरह संसद में हिंदू-सिख समुदाय के लिए भी कम से कम एक सीट आरक्षित करने की माँग की गई थी लेकिन उसे माना नहीं गया.
वे कहते हैं कि जब तक संविधान में ये व्यवस्था नहीं की जाती कि हिंदू सिख समुदाय को कुछ मिलेगा तब तक तो यह मानना चाहिए कि उनको कुछ नहीं मिलने वाला है.
दूसरी राय भी
हालांकि ऐसा सभी लोग नहीं मानते और कुछ लोगों का कहना है कि इस स्थिति के लिए हिंदू-सिख समुदाय ख़ुद ज़िम्मेदार है.
वे कहते हैं कि हिंदू-सिख समुदाय ख़ुद को अफ़ग़ान कहता ज़रुर है और कहने को उनकी बोली भी बोलता है लेकिन वह इस समाज की मुख्य धारा में शामिल होने की कोशिश नहीं कर रहा है.
उदाहरण के लिए किशन सिंह हुनरयार कहते हैं, "जब आप अपने आपको अफ़ग़ान कहते हैं तो अपने बच्चों को क्यों गुरुद्वारे के स्कूलों में पढ़ाते हैं क्यों उनको अफ़ग़ान बच्चों के साथ पढ़ने के लिए स्कूलों में क्यों नहीं भेजते?"
वे और भी कई सवाल उठाते हैं.
किशन सिंह कहते हैं कि उन्होंने अपने बच्चों को अफ़ग़ान स्कूलों में पढ़ाया और इस क़ाबिल बनाया कि वे मौक़ा मिलने पर अपने पैरों पर खड़े हो सकें.
वे पूछते हैं कि क्या हिंदू-सिख समुदाय ने अपने आपको इस लायक बनाया भी है कि सरकार के सामने जाकर अपनी माँगें रख सके?
किशन सिंह बताते हैं कि जब मौक़ा मिला भी तो इसका लाभ नहीं उठाया गया. इसका उदाहरण देकर वे कहते हैं, "करज़ई ने अपने दोस्त को हिंदू-सिख समुदाय के प्रतिनिधि के रुप में लोया जिरगा का सदस्य भी बनाया तो वे कांधार से बैठकों में भाग लेने ही नहीं आए."
उन्होंने कहा कि यदि कोई प्रतिनिधि ही नहीं होगा तो समुदाय की मांगें कौन रखेगा.
किशन सिंह कहते हैं, "आज यदि सरकार किसी को कुछ देना चाहे तो किसे दे, कुछ पढ़े-लिखे समझदार लोग तो हों जिन्हें कुछ दिया जा सके."
फ़िलहाल हिंदू-सिख समुदाय को इंतज़ार है कि जो लोग बुरे दिनों में बाहर चले गए थे और दूसरे देशों में शरणार्थी हो गए थे वे वापस लौटेंगे.
वे इंतज़ार कर रहे हैं कि वे लौटकर कुछ पूँजी निवेश भी करेंगे और तब उनमें से कुछ व्यवसायी बड़े भी होंगे.
लेकिन तब तक समुदाय के पास छोटे-छोटे काम धंधे हैं और वे उसी में रमे हुए हैं.
इस समय तो हालत ये है कि वे युद्धकाल में क्षतिग्रस्त हुए गुरुद्वारे की मरम्मत के लिए भी भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ओर देख रहे हैं.