http://www.bbcchindi.com

मंगलवार, 20 सितंबर, 2005 को 00:59 GMT तक के समाचार

विनोद वर्मा
बीबीसी संवाददाता, काबुल

बंजारों की एक लड़की परवीन

परवीन मोहमंद तलवासा काबुल में रहने वाली एक प्रगतिशील महिला हैं, वे एक द्वैमासिक पत्रिका निकालती हैं.

वो टेलीविज़न की सफल प्रज़ेंटर रह चुकी हैं और वॉयस ऑफ़ अमरीका के लिए नियमित रिपोर्ट करती हैं.

लोया जिरगा में सदस्य रह चुकी हैं और संविधान निर्माण के लिए बनाई गई समिति में भी परवीन एक महत्वपूर्ण सदस्य थीं.

वे एक गृहणी हैं और वे अफ़ग़ानिस्तान की संसद के लिए चुनाव लड़ रही हैं.

इसके अलावा भी उनकी एक विशेषता बच रहती है, वो ये कि परवीन मोहमंद तलवासा एक ऐसे समुदाय की सदस्य हैं जिसे अफ़ग़ानिस्तान में कोची कहा जाता है.

कोची अफ़ग़ानिस्तान की ख़ानाबदोश जाति है यानी बंजारा समुदाय है.

इस जाति के लिए अफ़ग़ानिस्तान की संसद में 249 में से 10 सीटें आरक्षित की गई हैं.

इन दस सीटों में से तीन कोची महिलाओं के लिए आरक्षित हैं जिसके लिए सात महिलाएँ मैदान में हैं और परवीन उनमें से एक हैं.

वे बताती हैं कि कोची समुदाय में अब दो तरह के लोग हो गए हैं एक वो जो अब भी ख़ानाबदोश हैं और मौसम के अनुसार अपनी जगह बदल लेते हैं और अभी भी टेंट में रहते हैं.

और दूसरे वो जो समय के साथ धीरे-धीरे बदल गए हैं और अब स्थाई रुप से एक जगह रहने लगे हैं.

ठीक-ठीक जानकारी तो नहीं लेकिन जनसंख्या का जो अनुमान लगाया गया है उसके अनुसार अफ़ग़ानिस्तान में उनकी संख्या 35 लाख के आसपास है.

वे मध्य, दक्षिण और दक्षिण पूर्वी अफ़ग़ानिस्तान में ज़्यादा रहते हैं.

कठिन ज़िंदगी

कोची जाति का पुश्तैनी काम था जानवर पालना. वो दो तरह के जानवर पालते थे. एक ऊँट जो सामान ढोने के काम आता था.

और दूसरा भेड़. जिसमें से ज़्यादातर मादा होती थी. मादा इसलिए कि उससे ऊन पर्याप्त मात्रा में निकलता है और दूसरे उसका दूध आसपास के इलाक़ों में बेचा जाता था.

लेकिन पिछले तीन दशक की लड़ाई की वजह से कोची के पास जानवर नहीं रह गए.

अब कोची के सामने सबसे बड़ी समस्या है रोज़गार की और इस समस्या के चलते हुआ यह है कि जो कोची जाति कभी दिहाड़ी मज़दूरी नहीं करती थी वो अब दिहाड़ी मज़दूर हो गए हैं.

एक जगह नहीं रहने के कारण बच्चे कभी पढ़ लिख नहीं पाए और अधिसंख्य कोची समुदाय निरक्षर ही है.

संसद का चुनाव लड़ रहीं परवीन का कहना है कि इस समय कोची समुदाय की एक ही माँग है कि उन्हें स्थाई रुप से बसने के लिए ज़मीन दे दी जाए.

चुनाव

ख़ुद अपनी कार चलाकर चुनाव प्रचार कर रहीं परवीन बताती हैं कि कोची समुदाय की ओर से चुनाव लड़ना आम उम्मीदवारों की तुलना में बेहद कठिन है.

एक तो यह कि कोची समुदाय पूरे अफ़ग़ानिस्तान में है इसलिए इस समुदाय के उम्मीदवारों को पूरे देश में चुनाव प्रचार करना पड़ रहा है.

यह अपने आपमें खर्चीला है और फिर यह दौरा भी आसान नहीं है.

वे बताती हैं कि अपने व्यावसायी पति के सहयोग से उन्हें चुनाव का ख़र्च ख़ुद ही उठाना पड़ रहा है.

टीवी प्रज़ेंटर होने के नाते उन्हें तो बहुत से लोग जानते हैं तो क्या इसका फ़ायदा भी उन्हें मिल रहा है, इस सवाल पर वे कहती हैं कि पहचान तो बनी है लेकिन जिनसे वोट लेना है उनके पास तो टीवी होता ही नहीं है.

अलबत्ता रेडियो की रिपोर्टर होने का फ़ायदा उन्हें मिल रहा है और लोग उन्हें तलवासा के नाम से जानते हैं.

अब तो वे केगदई नाम से एक द्वैमासिक पत्रिका निकालती हैं जिसका अर्थ होता है टेंट. ज़ाहिर है यह पत्रिका कोची समुदाय के बारे में ही बात करती है.

काबुल के हबीबिया हाईस्कूल के एक शिक्षक की बेटी परवीन ने अपनी पढ़ाई काबुल यूनिवर्सिटी से पूरी की है.

वो बताती हैं कि कोची समुदाय में ऐसा परिवार कम ही है जिनके बच्चे पढ़ लिख गए और आत्मनिर्भर हो गए.

वे आत्मनिर्भर भी हैं और आत्मविश्लास से भरपूर भी.

उन्हें विश्वास है कि वे अपने समुदाय का कुछ भला कर पाएँगी.