जयप्रकाश पाराशर
आमतौर पर रथयात्राओं के लिए पहचानी जाने वाली भाजपा ने 2005 में अपने 25 साल पूरे किए. भाजपा के इन 25 वर्षों पर एक नज़र.
अप्रैल 1980
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और जनता पार्टी की दोहरी सदस्यता के सवाल पर जब समाजवादियों ने मोरारजी सरकार को गिराया तो चरण सिंह भी ज्यादा दिन नहीं टिक पाए. चुनावों में जनता पार्टी के पतन के बाद 6 अप्रैल 1980 को दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की गई.
दिसंबर 1980 1980 के अंत में भारतीय जनता पार्टी ने गांधीवादी समाजवाद के फलसफे को स्वीकार किया और अपने आपको जनसंघ से अलग पार्टी की तरह पेश किया. मुंबई में इसका पहला अधिवेशन हुआ. जिसकी अध्यक्षता अटल बिहारी वाजपेयी ने की. वाजपेयी ही 1980 से 1986 तक भाजपा के अध्यक्ष रहे.
1983
संघ परिवार का ही एक अनुषंगी संगठन माने जाने वाली विश्व हिंदू परिषद ने अयोध्या में रामजन्मभूमि मुक्ति आंदोलन नाम का व्यापक अभियान छेड़ दिया. तब तक भाजपा ने आधिकारिक तौर पर इससे दूरी बनाए रखी.
1984
इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद जब 1984 के अंत में आम चुनाव हुए तो भाजपा को महज दो सीटें मिलीं. पार्टी के प्रमुख नेता वाजपेयी भी हार गए.
1986
पार्टी का नेतृत्व अब तक परदे के पीछे से कमान संभालने वाले लालकृष्ण आडवाणी के हाथ में आ गया. तत्कालीन राजीव गांधी सरकार के खिलाफ आरोप पत्र पेश किया गया जिसमें सरकार की अनेक मोरचों पर विफलताएं गिनाई गई थीं. पार्टी संगठन को फिर पटरी पर लाने की कवायद शुरू हो गई. भाजपा ने अन्य दलों के साथ तालमेल की संभावनाओं पर विचार करना शुरू कर दिया.
1987
प्रधानमंत्री राजीव गांधी के करीबी मित्रों और वीपी सिंह ने बोफोर्स मामले में राजीव गांधी व उनके परिवार पर निशाना साधना शुरू किया. वीपी सिंह तेजी से ईमानदार नेता की छवि के साथ उभरने लगे. उनके साथ तीसरे मोरचे के नेता आए. जनता दल के साथ भाजपा ने चुनावी तालमेल किया.
1988
वीपी सिंह के संभावित विकल्प के रूप में उभरने के साथ ही भाजपा और जनता दल ने करीब 85 फ़ीसदी सीटों पर आमने-सामने चुनाव नहीं लड़ने का फ़ैसला किया.
1989
आम चुनाव में जनता दल के साथ प्रत्यक्ष और वामपंथी दलों के साथ अप्रत्यक्ष समझौते का नतीजा यह निकला कि भाजपा 2 से छलांग मारकर 86 सीटों पर जा पहुंची. उत्तर भारत में उसे जबरदस्त जीत हासिल हुई. माना गया कि जनता दल के साथ समझौते का सबसे ज्यादा फायदा भाजपा को हुआ. भाजपा ने राष्ट्रीय मोरचे की सरकार को बाहर से समर्थन देने की घोषणा कर दी.
वीपी सिंह को समर्थन देने की गलती जल्दी समझ आने लगी. वीपी सिंह अपने जातीय वोट बैंक को मजबूत बनाने के प्रयास में लग गए. लिहाजा भाजपा ने भी पालमपुर (हिमाचल प्रदेश) अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित करके रामजन्मभूमि मुक्ति आंदोलन को आधिकारिक तौर पर एजेंडे में शरीक कर लिया.
7 अगस्त 1990
7 अगस्त 1990 को वीपी ने मंडल आयोग की सिफारिशें स्वीकार करने की संसद में घोषणा कर दी. फैसले में भाजपा को शरीक नहीं किया गया. मंडल आयोग के तहत पिछड़ा वर्ग को 27 फीसदी आरक्षण की सिफ़ारिश की गई. भाजपा नेताओं ने इसे वीपी का अपने लिए जातीय वोट बैंक तैयार करने की कोशिश माना.
अक्तूबर 1990
पार्टी अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने 1990 में सोमनाथ से अयोध्या तक रथयात्रा आरंभ कर दी. जिसका मकसद अयोध्या में राममंदिर का शिलान्यास करना था. अक्तूबर में हजारों की संख्या में कारसेवक अयोध्या में जमा हो गए. मुख्यमंत्री मुलायमसिंह यादव ने प्रतिबंध लगाया और कारसेवकों पर गोलीबारी हुई जिसमें काफी लोगों की मौत हुई और सैंकड़ों घायल हुए.
समस्तीपुर बिहार में लालकृष्ण आडवाणी की गिरफ्तारी के साथ ही रथ यात्रा समाप्त हो गई. भाजपा ने वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा कर दी.
1991
भारतीय जनता पार्टी 119 सीटों के साथ प्रमुख विपक्षी दल के रूप में उभरी. राजीव गांधी की चुनाव प्रचार के दौरान बम विस्फोट में मृत्यु होने के बाद कांग्रेस प्रमुख दल के रूप में उभरी. पीवी नरसिंहराव प्रधानमंत्री बने. भाजपा उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और हिमाचल प्रदेश में बड़ी शक्ति बनकर उभरी. जहां उसके क्रमश कल्याण सिंह, भैरोंसिंह शेखावत, सुंदरलाल पटवा और शांता कुमार मुख्यमंत्री बने.
मुरलीमनोहर जोशी भाजपा के अध्यक्ष बने. उन्होंने राष्ट्रीय एकता यात्रा कन्याकुमारी से कश्मीर तक की. उनका मकसद श्रीनगर के लालचौक में 26 जनवरी 1992 को राष्ट्रीय ध्वज फहराना था. यात्रा किसी तरह खत्म करनी पड़ी. जोशी 1993 तक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे.
6 दिसंबर 1992
भाजपा और विहिप ने अपने जनाधार को और मजबूत बनाने के लिए राममंदिर आंदोलन को गति देना जारी रखा. विहिप ने दिसंबर में अयोध्या में शिलान्यास के लिए कारसेवकों की बड़ी रैली का आयोजन किया. भाजपा के प्रमुख नेता इस दौरान अयोध्या में थे. 6 दिसंबर 1992 को भीड़ ने विवादास्पद ढांचे को तोड़ दिया. जिसके प्रतिक्रयास्वरूप देभभर में बड़े पैमाने पर दंगे हुए.
1993
उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश व हिमाचल प्रदेश में जहां भाजपा की सरकारें बर्खास्त की गई थीं वहां भाजपा को तगड़ा झटका लगा. उसके मतों में भारी कमी आई. मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी. उत्तर प्रदेश में उसके बहुमत में कमी आई. लेकिन दिल्ली व राजस्थान में उसकी स्थिति में सुधार आया.
1993-1998
लालकृष्ण आडवाणी ने एक बार फिर पार्टी की बागडोर अपने हाथ में ली. इस बार वह 1993 से 1998 तक अध्यक्ष रहे.
1995
आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, बिहार, उड़ीसा और गोवा में पार्टी की उपस्थिति बढ़ी. कर्नाटक भाजपा के लिए दक्षिण का प्रवेश द्वार बना जहां उसने विधानसभा में 40 सीटें हासिल कीं. महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ गठबंधन लाभकारी साबित हुआ.
मई 1996
भाजपा ने 16 मई से 1 जून की बहुत ही कम अवधि के लिए अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनाई, लेकिन बहुमत नहीं जुटा पाई. आडवाणी के नेतृत्व में लड़े चुनाव में भाजपा की संख्या 161 तक जा पहुंचीं.
फरवरी 1998
देवगौड़ा और इंदरकुमार गुजराल के नेतृत्व में संयुक्त मोरचे की सरकारें भी अल्पकालिक ही साबित हुईं. उनकी अस्थिरता में भाजपा ने स्थिर सरकार देने का नारा उछालना शुरू कर दिया. आखिर फरवरी 1998 के चुनावों में भाजपा अब तक के सबसे ऊंचे पायदान 182 तक पहुंच गई. लेकिन अप्रैल 1999 में विश्वासमत पर जयललिता का समर्थन नहीं मिलने के बाद सरकार गिर गई.
1998-2000
लालकृष्ण आडवाणी सरकार में चले गए थे. सुंदरसिंह भंडारी जैसे कई वरिष्ठ नेता राज्यपाल बन गए थे. लिहाजा अच्छे संगठक व निरापद माने जाने वाले कुशाभाऊ ठाकरे को कमान सौंपी गई.
1999
आख़िर 1999 के चुनावों में एनडीए को बहुमत की संख्या 296 मिल गई. भाजपा की संख्या तो 182 ही बनी रही. वाजपेयी फिर प्रधानमंत्री बने. भाजपा की अस्पृश्यता समाप्त हो गई थी.
2000
अगस्त 2000 में दक्षिण के दलित बंगारू को अध्यक्ष बनाया गया लेकिन तहलका प्रकरण में उनका नाम आने के बाद फरवरी, 2001 में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा.
मार्च 2001
बंगारू के हटने के बाद जना कृष्णमूर्ति सामने लाए गए. मार्च,2001 से 30 जून, 2002 के बीच अध्यक्ष रहे जना कृष्णामूर्ति को पार्टी संगठन में युवाओं को मौका देने के नाम पर बीच में ही हटना पड़ा और पार्टी की कमान आडवाणी के विश्वस्त वैंकेया नायडू के पास चली गई.
अप्रैल 2004 में पार्टी की बागडोर फिर से आडवाणी के पास आने तक वैकेंया ही पार्टी अध्यक्ष रहे लेकिन वह बाद में उपाध्यक्ष बन गए.
15 नवंबर 2002
विहिप ने अयोध्या ढांचे ध्वंस पर विजय यात्रा निकालने की योजना बनाई. भाजपा ने यात्रा का समर्थन किया.
गुजरात में हुए चुनावों में पार्टी को भारी सफलता मिली. प्रधानमंत्री वाजपेयी ने पार्टी को विजय पर्व मनाने को कहा.
मई 2003
वेंकैया उस समय काफी बड़ी मुसीबत में फंस गए जब उन्होंने आडवाणी को महत्व देने के लिए विकासपुरुष बनाम लौह पुरुष की बहस छेड़ दी. उन्हें वाजपेयी की नाराजगी झेलनी पड़ी.
26 जून 2003
सत्ता में आने के बाद पार्टी ने हिंदुत्व के मोरचे पर रुख कुछ नरम किया. भाजपा ने कहा कि मथुरा और काशी उसके एजेंडे में नहीं हैं.
10 मार्च 2004
आडवाणी ने चुनावों से ठीक पहले इंडिया शाइनिंग या भारत उदय का नारा दिया. 10 मार्च को कन्याकुमारी से भारत उदय यात्रा शुरू कर दी.
14 मई 2004
समय से पहले कराए आम चुनाव में पार्टी पिछड़ गई. उसके सहयोगी दलों को भी कम सीटें मिलीं. गठबंधन में से भी पासवान और करुणानिधि से जैसे घटक अलग हो गए. हार के बाद वाजपेयी ने इस्तीफ़ा दे दिया.
9 सितंबर 04
लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व संभालने के बाद से ही संकट घिरे रहे. 9 सितंबर 2004 को तिरंगा यात्रा निकाली गई. मुख्यमंत्री पद से हटाई गई उमा भारती ने बैठक में खुले आम आडवाणी के खिलाफ विद्रोह किया. दूसरी पंक्ति के नेताओं में अंतरकलह खुलकर सामने आ गया. महाराष्ट्र चुनावों में विफलता ने झटका दिया.
30 मई 2005
आडवाणी अपनी छवि परिवर्तन के लिए पाकिस्तान की यात्रा पर निकले. जहां जिन्ना को राष्ट्रवादी करार दिए जाने और बाबरी मसजिद ध्वंस पर दुख जाहिर करने के उनके बयानों ने विहिप व आरएसएस में उफ़ान ला दिया. आरएसएस नेता आडवाणी को अध्यक्ष पद से हटाने पर अड़े.
9 जून 05
केएस सुदर्शन व सिंघल ने आडवाणी के बयानों के मद्देनजर महत्वपूर्ण बैठक की. विहिप नेताओं ने आडवाणी के खिलाफ़ हल्ला बोल दिया.
29 जून 05
भाजपा के नेताओं का समर्थन आडवाणी को जाहिर करने के लिए वेंकैया ने आरएसएस के तीन प्रमुख नेताओं से मुलाकात की.
सितंबर 05
मदनलाल खुराना ने खुलेआम आडवाणी की आलोचना की. उन्हें पार्टी से निकाला गया. खुराना के समर्थन में वाजपेयी आए. माफ़ी माँगने पर उन्हें वापस पार्टी में ले लिया गया.