बुधवार, 14 सितंबर, 2005 को 12:12 GMT तक के समाचार
गोविंदाचार्य
भाजपा के पूर्व महासचिव
आदर्शवाद का सामान्य रूप से राजनीतिक क्षेत्र में क्षरण हुआ है तो भारतीय जनता पार्टी में भी वो क्षरण दिखाई पड़ता है.
और इसका प्रमुख कारण है कि राजनीतिक क्षेत्र के स्वाभाविक विकास से बचने के लिए जो इंतज़ाम होने चाहिए थे उसमें कमी रह गई और इसे मैं ‘‘वैज्ञानिक कार्यपद्धति का अभाव’’ कहता हूँ.
कांग्रेस एक बड़ा राजनीतिक दल है, उसका अपना तरीका है, सीपीएम एक बंद काडर पार्टी है और भाजपा को एक जनआधारित काडर संगठन बनना था मगर ये हुआ नहीं.
सबसे बड़ी त्रासदी ये है कि राजनीतिक दल मूल्यों और मुद्दों से भटक कर केवल सत्ता के निरंकुश खेल के हिस्से बन गए हैं.
भाजपा भी इसकी अपवाद नहीं है. आज की तारीख़ में सभी पार्टियों में 19-20 का फ़र्क रह गया है.
इस पार्टी में नेतृत्व वर्ग और सामान्य समर्थक वर्ग के चिंतन और व्यवहार के स्तर पर बहुत बेमेलपन है.
ये बेमेलपन दुरूस्त किए बगैर तरह-तरह के पैबंद लगाने से काम नहीं चलेगा उसके लिए एक वैज्ञानिक कार्यपद्धति की ज़रूरत रहेगी.
सिर्फ़ भाजपा ही क्यूं सभी दल भटक गए हैं. बुद्धदेव भट्टाचार्य ने जिस तरह से विदेशी निवेश की पुरजोर वकालत की, उससे बेचारे मार्क्स और ऐंजेल्स कहीं कराह रहे होंगे.
भाजपा में धारा 370, राममंदिर, समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों से हटने के अलावा दीनदयाल द्वारा प्रतिपादित स्वदेशी और विकेंद्रीकरण पर आधारित अर्थनीति का पालन होना था.
उसके बदले बाज़ारवाद और अंधाधुंध वैश्वीकरण की अंधी दौड़ में भाजपा के लोग भी शामिल हो गए. लोगों का भ्रम टूटा और सामान्य कार्यकर्ता ठगा सा महसूस करने लगा.
अनुशासन
संगठन में अनुशासन तो हमेशा ही लोकतंत्र के साथ ही मिलकर चलेगा. इसके लिए आवश्यक है श्रद्धा, विश्वास और संवाद.
यदि विश्वास और संवाद में कमी रहेगी तो समस्याएं न तो समय पर मालूम चलेंगी और न ही उनका समाधान होगा.
परिणामत जब भी वो कही जाएंगी तो इसे अनुशासनहीनता माना जाएगा. पार्टी के भीतर समाधान की प्रक्रिया धीमी हो जाए तो स्वाभाविक रूप से वो चीज़े अनुशासनहीनता के रूप में ही सामने आएंगी. कमोबेश इसमें सभी लोग दोषी होंगे.
पद्धति का अंकुश सब पर रहना ज़रूरी है. अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग न्याय से समस्याएं पैदा होती है.
सभी किसी एक संहिता से बंधे. सामान्य कार्यकर्ता एक अलग प्रकार की जीवन शैली का हिमायती रहे और नेतृत्व वर्ग अलग शैली में जिए तो ऐसा बेमेलपन अनुशासनहीनता के नाम पर दबाया नहीं जा सकता.
बात अनुशासनहीनता की कम विश्वास और संवाद की ज़्यादा है.
(मोहनलाल शर्मा से बातचीत पर आधारित)