शुक्रवार, 09 सितंबर, 2005 को 11:02 GMT तक के समाचार
आशुतोष चतुर्वेदी
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
भारतीय जनता पार्टी में महाभारत जारी है. पार्टी जिन्ना प्रकरण से अभी उबर नहीं पाई थी कि खुराना प्रकरण ने उसे ग्रस लिया है.
पार्टी में कोई एक विवाद नहीं है, अनेक स्तरों पर मोर्चे खुले हुए हैं. अब तक माना जा रहा था कि पार्टी में निचले स्तर पर ही समस्याएँ हैं और भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में तालमेल को लेकर संकट है.
लेकिन अपने को औरों से अलग और अनुशासित दल का दावा करने वाली पार्टी में हर स्तर पर घमासान छिड़ा हुआ है.
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ अभियान अर्से से चल रहा है. इसके अलावा झारखंड के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर के ख़िलाफ़ पार्टी नेताओं ने ही मोर्चे खुले हुए हैं.
भाजपा अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने मदनलाल खुराना को निष्कासित किया तो अटल बिहारी वाजपेयी ने उनका सार्वजनिक रूप से बचाव किया.
इससे यह सार्वजनिक हो गया है कि पार्टी में ऊपर से नीचे तक हर स्तर पर गंभीर मतभेद हैं और पार्टी नेता कई धड़ों में बँट हुए हैं.
आडवाणी पर संकट
जिन्ना प्रकरण से साफ़ हो गया था कि पार्टी में केवल अनुशासन की समस्या नहीं है बल्कि पार्टी गंभीर वैचारिक संकट से भी जूझ रही है.
पार्टी के भीतर ही अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी की स्थित ख़राब है और उनपर लगातार हमले हो रहे हैं.
मदनलाल खुराना, यशवंत सिन्हा, प्यारेलाल खंडेलवाल, मुरलीमनोहर जोशी, उमा भारती और यहाँ तक कि अनजाने से पार्टी सांसद बलिराम कश्यप तक पार्टी अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी की सत्ता पर सवाल खड़े कर रहे हैं.
अभी तक लालकृष्ण आडवाणी संघ के ख़िलाफ़ मोर्चा खोले हुए थे और वाजपेयी उनका साथ दे रहे थे.
लेकिन वाजपेयी के बयान से लगता है कि उन्होंने अपने समर्थन की बैसाखी खींच ली है.
ऐसे में आडवाणी के लिए एक साथ दो मोर्चों पर जूझना मुश्किल भरा काम होगा.
संघ के नेता खुलेआम कहते रहे हैं कि आडवाणी को पद छोड़ देना चाहिए. ऐसे में आडवाणी के लिए वाजपेयी से समझौता करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता है.
इस सुलह में वाजपेयी को 'कृष्ण' और अपने को उनका 'अर्जुन' बताने वाले मदनलाल खुराना का निष्कासन वापस हो सकता है.