मंगलवार, 23 अगस्त, 2005 को 12:44 GMT तक के समाचार
हरीश साल्वे
पूर्व सॉलीसिटर जनरल
निजी कॉलेजों में आरक्षण पर सरकार की टीका टिप्पणी पर मुख्य न्यायाधीश लाहोटी ने अपना क्षोभ व्यक्त भर किया है.
दरअसल कार्यपालिका के वरिष्ठ लोग सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर टिप्पणी कर रहे थे. उस पर मुख्य न्यायधीश ने अपना क्षोभ व्यक्त किया है.
माना जाता है कि संविधान की व्याख्या में सुप्रीम कोर्ट की राय अंतिम होती है. आप चाहें तो क़ानून में संशोधन कर सकते हैं लेकिन अदालत के फ़ैसले पर राजनीति उचित नहीं है.
ऐसा आभास पैदा किए जाने की कोशिश की जा रही है कि अदालत आरक्षण विरोधी है जबकि अदालतें संविधान की पक्षधर हैं.
अब अगर सुप्रीम कोर्ट संसद की कार्यवाही पर या फिर कुछ मंत्रियों के कामकाज पर टिप्पणी करने लगे तो मुश्किलें पैदा हो जाएँगीं.
मैं साफ़ कर दूँ कि सुप्रीम कोर्ट आरक्षण के आड़े नहीं आ रहा लेकिन दिक्कत यह है कि सरकार अपने सामाजिक वादे को बिना किसी रोक-टोक के अपने हिसाब से पूरा करना चाहती है.
अदालतें संविधान के मौलिक अधिकार को तोड़ कर उत्तरदायित्व नहीं निभा सकतीं.
सरकार अगर चाहती है तो ग़रीबों की अपने संसाधनों से मदद करें लेकिन यह उचित नहीं है कि कोई व्यक्ति अपने पैसे से कॉलेज स्थापित कर रहा है, उसके जेब में हाथ डाल कर कहे कि वो फोकट में लोगों को पढाए.
सरकार का अपना काम है और न्यायपालिका का अपना. एक दूसरे के कार्य पर टिप्पणी करना उचित नहीं है.
(रेहान फ़ज़ल से बातचीत पर आधारित)