बुधवार, 17 अगस्त, 2005 को 16:25 GMT तक के समाचार
सैयद बदरुल अहसन
ढाका में न्यू एज के डिप्टी एडीटर
बांग्लादेश में आधे घंटे के भीतर 300 से ज़्यादा बम धमाके हुए. ऐसा होने के बाद बांग्लादेश के लिए चिंतित होने के कई कारण हैं क्योंकि गुप्तचर सेवाएँ सुरक्षा सुनिश्चित करने में असमर्थ रही हैं.
जिस तरह से एक साथ कई धमाके हुए उससे पता चलता है कि जो लोग बांग्लादेश की राजनीति के हाशिए पर हैं उनके हौसले कितने बुलंद हो गए हैं.
इससे बांग्लादेश के बारे में ये महत्वपूर्ण बात भी सामने आई है कि देश में कट्टर दक्षिणपंथी तत्वों की मौजूदगी का राजनीतिक नेता विशेष कर सत्तापक्ष के नेता चाहे खंडन करते आए हों, लेकिन सच्चाई कुछ और ही है.
'सब ठीक नहीं'
विभिन्न घटनास्थलों पर प्रतिबंधित दक्षिणपंथी संगठन जमातुल मुजाहिदीन के पर्चे बाँटने की बात सामने आई हैं.
लेकिन जो कोई भी संगठन इसके लिए ज़िम्मेदार हों ये स्पष्ट है कि वे सुसंगठित है और देश में अराजकता फैलाने के लिए पूरी तरह तैयार है.
कोई अब ऐसा दावा नहीं कर सकता कि सब ठीक-ठाक है. सरकार नहीं कह सकती कि सब कुछ उसके नियंत्रण में है.
इन हिंसक घटनाओं को अंजाम देने वालों ने न केवल एक बड़े क्षेत्र में धमाके किए बल्कि समय और घटनास्थलों को देखते हुए उनकी रणनीति पर भी ध्यान देना चाहिए.
अदालतों, शहरों के केंद्रीय भाग, विश्वविद्यालयों आदि में कई जगह इन्होंने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है.
जब देश के सभी 64 ज़िले इन धमाकों की चपेट में आ जाएँ तो इस बारे में अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं कि बांग्लादेश के ख़िलाफ़ षड्यंत्र कितना व्यापक और सुनियोजित है.
'अल्लाह के सैनिक'
इन लोगों के बुलंद हौसले का अंदाज़ा इससे भी लगता है कि इन्होंने सरकार से आदमी के बनाए क़ानूनों को ख़ारिज करने और 'अल्लाह के सैनिकों' का विरोध न करने को कहा है.
उन्होंने उन सभी लोगों को चेतावनी भी दी है जो इस्लामी क़ानून लागू किए जाने की ज़रूरत से सहमत नहीं हैं.
उन ग़ैर-सरकारी संगठनों को भी चेतावनी दी गई है जो 'इस्लामी उद्देश्यों' के ख़िलाफ़ काम कर रहे हैं.
पिछले कुछ सालों से जिस तरह की धार्मिक कट्टरता इस देश में देखी गई है, ये धमाके उस तरह के रुझान का नतीजा माने जा सकते हैं.
बलि के बकरे न खोज़ें
आज बांग्लादेश में जो स्थिति है वह बांग्ला भाई के प्रमुखता में आने और अहमदिया समुदाय के विरुद्ध चलाए गए अभियान का नतीजा है.
ये हमारा दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि सरकार ने तमाम तरह के संकेत देखने के बावजूद इन्हें नज़रअंदाज़ किया.
ये अभूतपूर्व है क्योंकि किसी भी देश में इतने बड़े पैमाने पर इस तरह की गतिविधियाँ नहीं हुई हैं.
अब सरकार की ज़िम्मेदारी बन जाती है कि वह नागरिकों को सुरक्षा के बारे में उठाए जाने वाले कदमों के बारे में आश्वस्त करे.
अनुभव के आधार पर ये नहीं कहा जा सकता कि प्रशासन इस मामले की गहराई तक पहुँच पाएगा.
लेकिन ये सभी जानते हैं कि बुधवार के धमाके सरकार के लिए चेतावनी की घंटी के समान थे और यदि सरकार ख़तरों के बारे में सचेत नहीं होती तो भविष्य शायद हमारी कल्पना से ज़्यादा अंधकार भरा हो सकता है.
व्यापक जाँच होनी चाहिए लेकिन प्रशासन चला रहे किसी भी व्यक्ति को मामले से नहीं जुड़े हुए नागरिकों को तंग करने या बलि के बकरे नहीं ढ़ूँढ़ने चाहिए.
प्रशासन को अपने गिरेबान में झाँकना चाहिए और अपने आसपास की वस्तुस्थित देखनी चाहिए.