मंगलवार, 16 अगस्त, 2005 को 12:17 GMT तक के समाचार
सुप्रीम कोर्ट ने शरीयत अदालतें स्थापित करने को चुनौती देने वाली याचिका पर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, केंद्र सरकार और सात राज्यों को नोटिस जारी किए हैं.
जनहित याचिका में आरोप लगाया गया है कि शरीयत अदालतें समानांतर अदालतों की तरह काम कर रही हैं.
न्यायमूर्ति वाईके सभरवाल की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने विश्वलोचन मदन की जनहित याचिका पर केंद्र सरकार के साथ-साथ उत्तर प्रदेश, हरियाणा, असम, मध्य प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, दारुल उलूम और मुस्लिम फॉर डेमोक्रेसी को नोटिस जारी किए हैं.
बहुचर्चित इमराना, असूबी और ज्योत्सना आरा जैसे प्रकरणों का हवाला देते हुए याचिका में कहा गया है कि मौजूदा न्यायपालिका के समानांतर इस्लामी अदालतें बनाई जा रही हैं.
याचिका में कहा गया है कि मस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और ऐसे ही अन्य संगठन समानांतर न्याय व्यवस्था स्थापित कर रहे हैं और इनको ग़ैरक़ानूनी और असंवैधानिक घोषित किया जाना चाहिए.
याचिकाकर्ता विश्वलोचन मदन का कहना है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और देवबंद स्थित दारुल उलूम ऐसे संगठन हैं जो भारतीय मुसलमानों के निजी मामलों में दख़ल दे रहे हैं और फ़तवे जारी कर रहे हैं.
दलील
दूसरी ओर, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता कासिम रसूल इलियास ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि इस्लामी शरियत अदालतें 1921 से चल रही हैं.
उनका कहना था कि इनका मक़सद न्यायिक प्रणाली की मदद करना है.
उनकी दलील है कि देश में बिजली, टेलीफ़ोन और इस तरह की अन्य अदालतें काम कर रही हैं, उसी तरह शरीयत अदालतें हैं.
प्रवक्ता का कहना था कि शरियत अदालतें वहीं मामले हाथ में लेती हैं जिनका ताल्लुक मुस्लिम पर्सनल लॉ से है.
कासिम रसूल इलियास का कहना था कि अदालतें भी मुस्लिम क़ानूनों के तहत फ़ैसला देती हैं और शरीयत अदालतें भी इसी आधार पर निर्णय सुनाती हैं.
उनका कहना था कि शरीयत अदालतों में न्याय आसानी से और जल्द मिल जाता है.