बुधवार, 27 जुलाई, 2005 को 10:31 GMT तक के समाचार
सुप्रीम कोर्ट ने केपीएस गिल की वह याचिका खारिज कर दी है जिसमें उन्होंने महिला प्रशासनिक अधिकारी के साथ छेड़छाड़ के मामले में दोषी ठहराए जाने के फ़ैसले को चुनौती दी थी.
पंजाब में चरमपंथ के ख़िलाफ़ कार्रवाई का नेतृत्व करने वाले केपीएस गिल पर आरोप था कि उन्होंने 17 साल पहले एक समारोह में प्रशासनिक अधिकारी रुपन देओल बजाज के साथ छेड़छाड़ की थी.
पहले ज़िला सत्र न्यायालय ने फिर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराया था और इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ गिल ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था.
जबकि रुपन देओल बजाज ने एक याचिका दायर करके कहा था कि केपीएस गिल की सज़ा बढ़ाई जाए.
न्यायमूर्ति केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाले खंडपीठ ने केपीएस गिल और रुपेन देओल बजाज दोनों की याचिका खारिज कर दी.
सज़ा के तहत गिल को तीन साल के प्रोबेशन पर रहना होगा और दो लाख रुपए का मुआवज़ा देना होगा.
मुआवजे की राशि के बारे में अदालत ने कहा है कि मुआवज़े की राशि के उपयोग के बारे में उच्च न्यायालय फ़ैसला करेगा.
रुपेन देओल बजाज ने यह राशि लेने से इंकार करते हुए कहा है कि यह राशि किसी महिला संगठन को दे दी जाए.
पुराना मामला
केपीएस गिल अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं लेकिन लेकिन अभी भी उन्हें चरमपंथ के मामलों में विशेषज्ञ माना जाता है.
प्रशासनिक अधिकारी रूपन बजाज देओल ने आरोप लगाया था कि जुलाई 1988 में एक पार्टी में उनके साथ अभद्र व्यवहार किया था.
जब केपीएस गिल पंजाब के पुलिस महानिदेशक थे.
रुपेन देओल ने 29 जुलाई को रिपोर्ट दर्ज करवाई थी लेकिन यह मामला आगे 30 अक्तूबर 1995 को बढ़ सका जब इस मामले में उच्च न्यायालय ने हस्तक्षेप किया.
सबसे पहले सत्र न्यायाधीश ने केपीएस गिल को धारा 354 और धारा 509 के तहत दोषी पाया था. और तीन महीने के सश्रम कारावास की सज़ा सुनाई थी और दो लाख रुपए का जुर्माना अदा करने को कहा था.
इसके अलावा अदालत ने कहा था कि वे मुक़दमे का खर्च भी उठाए और सार्वजनिक स्थलों पर शराब का सेवन न करें.
जब मामला हाईकोर्ट में पहुँचा तो तीन महीने की सज़ा के बदले तीन साल के प्रोबेशन की सज़ा सुना दी गई और मुआवज़े को बरक़रार रखा गया.
दोषी पाए गए व्यक्ति को प्रोबेशन के तहत एक अधिकारी की निगरानी में रहना होता है और अच्छा आचरण करना होता है.