सोमवार, 25 जुलाई, 2005 को 01:24 GMT तक के समाचार
सुबीर भौमिक, बीबीसी संवाददाता
भारत के असम राज्य में एक ग्रामीण को बिना किसी मुक़दमे के आधी से अधिक सदी जेल में बिताने के बाद रिहा किया गया है.
गोहाटी से 64 किलोमीटर दूर सिल्सांग गाँव के रहनेवाले 77 वर्षीय मचांग लालुंग को 1951 में गिरफ़्तार किया गया था.
पुलिस के अनुसार उन्हें "गंभीर नुक़सान पहुँचाने के लिए" पकड़ा गया था.
इस अपराध के लिए आमतौर पर 10 साल की सज़ा दी जाती है.
पुलिस का कहना है कि मचांग लालुंग पर लगाए गए आरोप का कोई सुबूत नहीं मिलने के बाद उन्हें गिरफ़्तारी के साल भर बाद एक मनोरोग केंद्र में भेज दिया गया.
"भूल गए"
असम के एक मानवाधिकार कार्यकर्ता संजय बोरबोरा कहते हैं,"ऐसा लगता है कि उस घटना के बाद पुलिस मचांग के बारे में बिल्कुल भूल ही गई".
1967 में उस मनोरोग केंद्र के अधिकारियों ने मचांग को स्वस्थ घोषित करते हुए कहा कि वे उन्हें रिहा करना चाहते हैं.
लेकिन पुलिस ने उन्हें रिहा करने के बजाय दूसरी जेल में भेज दिया.
संजय बोरबोरा कहते हैं कि इस समय तक मचांग को अदालत में पेश नहीं किया गया और जेल में ही रखा गया.
हैरत की बात ये रही कि मचांग के घरवालों ने भी उनकी सुध छोड़ दी.
पिछले वर्ष स्थानीय मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में गुहार लगाई जिसने तत्काल इसपर कार्रवाई करते हुए मचांग की रिहाई की माँग की.
इसके बाद पिछले सप्ताह मचांग को एक रूपए के निजी मुचलके पर रिहा कर दिया गया.
निष्ठुर व्यवस्था
लालुंग को रिहा करनेवाले मजिस्ट्रेट एच के शर्मा ने स्वयं असम और भारत की क़ानून प्रक्रिया की "सुस्त रफ़्तार और अक्षमताओं" पर रोष प्रकट किया.
मजिस्ट्रेट शर्मा ने कहा,"ना तो कार्यपालिका और ना ही न्यायपालिका केवल प्रक्रिया और तकनीकी प्रावधानों के नाम पर मचांग लालुंग को इतने समय तक जेल में रखने के बारे में अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ सकती है".
संजय बोरबोरा ने बताया कि मचांग लालुंग को अब पुलिस से हर्जाना वसूलना चाहिए, लेकिन इतने समय बाद वो शायद ये करना नहीं चाहते.
संजय बोरबोरा ने कहा,"वह एक साधारण ग्रामीण हैं जिनका जीवन एक निष्टुर व्यवस्था ने बर्बाद कर दिया. उन्हें अधिकारियों से लाखों-करोड़ो रूपए का हर्जाना माँगना चाहिए लेकिन मुझे लगता नहीं कि उन्हें इस बारे में कुछ पता भी है".
वापस गाँव में
मचांग लालुंग की रिहाई के बाद उन्हें उनके गाँव ले जाया गया जहाँ केवल एक गाँववाले ने उनको पहचाना.
एक पुलिस अधिकारी बी दास ने बताया कि मचांग लालुंग को गाँव के मुखिया को सौंप दिया गया क्योंकि वहाँ उनका कोई संबंधी नहीं था.
बी दास ने कहा,"सिल्सांग पहुँचने के बाद उनके चेहरे पर ना तो कोई भाव था, ना ही उन्होंने कुछ कहा".
पुलिस अधिकारी के अनुसार लगता नहीं कि मचांग लालुंग को अपने अतीत के बारे में कुछ याद भी है.