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शनिवार, 23 जुलाई, 2005 को 11:09 GMT तक के समाचार

सीमा चिश्ती
संपादक, बीबीसी हिंदी, दिल्ली

जनसंख्या नीति में बदलाव के संकेत

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जनसंख्या नीति में बदलाव के संकेत दिए हैं. उन्होंने कहा है कि वो जनसंख्या नियंत्रण के लिए किसी भी तरह के दबाव के ख़िलाफ़ हैं.

पिछले कुछ दशकों की नीति से हटकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि जनसंख्या नियंत्रण नहीं जनसंख्या स्थरीकरण होना चाहिए.

उन्होंने कहा कि भारत के सामने एक बड़ी चुनौती जनसंख्या को स्थिर करने की है. 1951 में जनसंख्या 36 करोड़ थी जो आज लगभग 110 करोड़ हो गई है.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि 'जनसंख्या नियंत्रण के लिए ज़ोर ज़बरदस्ती की नीति किसी भी स्वतंत्र समाज में स्वीकार नहीं की जा सकती है.'

प्रधानमंत्री ने कहा कि महिलाओं और लड़कियों की सेहत पर ध्यान देना होगा. साथ ही शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का विकास और देशभर में संतुलित विकास ज़्यादा ज़रूरी है.

प्रधानमंत्री का कहना था कि जनसंख्या नीति का देश की विकास नीति के साथ जब तक तालमेल नहीं होगा तब तक जनसंख्या स्थिरता का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकेगा.

उन्होंने इस मामले में केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश के अनुभवों का लाभ उठाने की बात कही.

अलग नीति

जनसंख्या नीति भारत में समवर्ती सूची का हिस्सा है लिहाज़ा कई राज्यों ने इस पर अपनी अलग अलग नीतियाँ अपनाई हैं.

सात राज्यों ने पंचायती चुनावों में खड़े होने के लिए उन लोगों को मान्य नहीं समझा जाता था जिनके दो से ज़्यादा संतानें थीं.

इन सात राज्यों में से हिमाचल प्रदेश ने यह क़ानून बदल दिया है और समझा जा रहा है कि मध्य प्रदेश भी इसको बदलने का इच्छुक है.

सरकार ने इस बैठक में पाँच राज्यों को सलाह दी है कि वे भी इस क़ानून को बदलने पर विचार करें.

भारत सरकार ने 2010 तक जनसंख्या वृद्धि दर को 2.1 प्रतिशत तक लाने का लक्ष्य रखा है किंतु देश के कुछ राज्यों में जैसे उत्तर प्रदेश में वर्तमान दर 4.4 प्रतिशत है.

वहीं केरल, तमिलनाडु और गोवा में दर एक प्रतिशत के आसपास है. सरकार ने दक्षिण भारत के कुछ राज्यों के तजुर्बे को वहाँ बेहतर सुविधाओं और विकास दर को मॉडल के रूप में स्वीकार किया है.

भारत में जनसंख्या नीति हमेशा से विवादों के घेरे में रही है. पहले की सरकारों ने छोटे परिवार के लिए बहुत ज़ोरदार अभियान चला रही थीं.

लेकिन 1970 के दशक में इमरजेंसी के दौरान नसबंदी और फिर काँग्रेस की पराजय के बाद सरकारों ने आक्रामक अभियान नहीं चलाया.

लेकिन भाजपा जैसी पार्टियों का मानना है कि परिवार नियोजन में विश्वास न होने के कारण देश में मुसलमानों और ईसाइयों की संख्या बढ़ रही है.

लेकिन प्रधानमंत्री के इस बयान को कि लोग भारत की कमज़ोरी की जगह संसाधन बनें, जनसंख्या के प्रति भारत के नज़रिए में बदलाव का संकेत माना जा रहा है.