मंगलवार, 12 जुलाई, 2005 को 13:32 GMT तक के समाचार
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने असम राज्य में ग़ैरक़ानूनी तरीके से पहुँचनेवाले बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान के लिए लागू विवादास्पद क़ानून, आईएमडीटी (इल्लीगल माइग्रेंट्स डिटरमिनेशन थ्रू ट्राइब्यूनल) क़ानून को असंवैधानिक क़रार दे दिया है.
भारत के मुख्य न्यायाधीश आरसी लोहाटी की अध्यक्षता वाले तीन सदस्यीय खंडपीठ ने असम गण परिषद के सांसद सर्वानंद सोनोवाल की जनहित याचिका पर अपने फ़ैसले में इस क़ानून को निरस्त कर दिया.
इसके तहत गठित सभी न्यायाधिकरण तत्काल प्रभाव से काम नहीं करेंगे.
सोनावाल ने याचिका में आरोप लगाया था कि असम में ग़ैरक़ानूनी तरीके से रहनेवाले बांग्लादेशियों की बढ़ती संख्या ने राज्य में क्षेत्रीय संतुलन को बिगाड़ कर रख दिया है.
उनका आरोप था कि क़ानून सिर्फ़ राजनीतिक दलों के वोट बैंक में इजाफ़े को बढ़ावा दे रहा है.
इस जनहित याचिका में दावा किया गया था कि असम के तत्कालीन राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल एस के सिन्हा ने अपनी रिपोर्ट में बांग्लादेशियों की अवैध घुसपैठ पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि इससे इस क्षेत्र की आबादी में क्षेत्रीय असंतुलन उत्पन्न हो जाएगा.
क़ानून
अवैध बांग्लादेशियों की पहचान के इरादे से यह क़ानून काँग्रेस पार्टी के शासनकाल में 1983 में बनाया गया था.
इस क़ानून के तहत अवैध प्रवासी की नागरिकता सिद्ध करने का दायित्व शिकायतकर्ता का था.
यह क़ानून केवल असम में लागू था और अब यहाँ भी पूरे देश की तरह ही विदेशी नागरिकता क़ानून लागू हो गया है.
असम गण परिषद और ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) और अन्य राजनीतिक दलों ने इस क़ानून का कड़ा विरोध किया था.
आसू के मुख्य सलाहकार समुज्जल भट्टाचार्य का कहना था, ''असम में रह रहे भारतीय नागरिकों को डरने की कोई आवश्यकता नहीं है लेकिन 1971 के बाद असम में प्रवेश करनेवाले बांग्लादेश के लोगों को जाना होगा. ''
1971 में बांग्लादेश की स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान अनेक बांग्लादेशी भारत भाग आए थे लेकिन बाद वे भारत में ही रह गए.
लेकिन असम के संयुक्त अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रमुख हाफिज़ रशीद अहमद चौधरी का कहना था कि असम की पुलिस और नौकरशाही क्षेत्रीय ग्रुपों से मिलकर अल्पसंख्यकों को निशाना बनाती है.
ऐसे में आईएमडीटी ही राज्य में एकमात्र बचाव का संवैधानिक रास्ता था.
इस फ़ैसले को केंद्र में सत्तारूढ़ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के लिए एक झटका माना जा रहा है.
उधर भाजपा और विश्व हिंदू परिषद ने अदालत के इस फ़ैसले का स्वागत किया है.