रविवार, 10 जुलाई, 2005 को 07:21 GMT तक के समाचार
भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (भेल) के विनिवेश के मसले को लेकर यूपीए अध्यक्ष सोनिया गाँधी के साथ वामपंथी दलों की बैठक बेनतीजा रही है.
हालाँकि इस मुलाक़ात के बाद मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के महासचिव प्रकाश कारत ने कहा है कि इस बैठक के बाद उन्हें उम्मीद है कि मसले का सौहार्द्रपूर्ण हल निकल आएगा.
यूपीए सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे वामपंथी दल भेल के 10 प्रतिशत शेयरों के विनिवेश करने के सरकार के फ़ैसले से नाराज़ हैं.
उन्होंने नाराज़गी में यूपीए की बैठकों में हिस्सा न लेने की भी घोषणा कर रखी है.
यूपीए की अध्यक्ष सोनिया गाँधी से यह उनकी दूसरी मुलाक़ात थी. पहली बार वामपंथी नेता पहली जुलाई को सोनिया गाँधी से मिले थे.
वे इस बारे में वे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से भी चर्चा कर चुके हैं.
बैठक
वामपंथी नेता रविवार की सुबह सोनिया गाँधी से मिले.
इस बैठक के बाद कांग्रेस महासचिव और सोनिया गाँधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल ने जो कुछ कहा और जो सीपीए के महासचिव प्रकाश कारत ने जो कुछ कहा उसका सार यह था कि फ़िलहाल कोई हल नहीं निकाला जा सका है.
दोनों ही नेताओं ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि जल्दी ही इस मसले का सौहार्द्रपूर्ण हल निकल आएगा.
अभी दोनों ही नेताओं ने यह नहीं बताया कि यह हल किस तरह का होगा.
वामपंथी नेताओं के अनुसार उन्होंने सोनिया गाँधी से इस मसले में हस्तक्षेप करने की अपील की है.
प्रकाश कारत ने पत्रकारों से बातचीत में बताया, "हमने सोनिया गाँधी से कहा है कि वे देखें कि नवरत्न कंपनियों के बारे में सरकार न्यूनतम साझा कार्यक्रम के अनुसार ही चले."
वामपंथी दलों की ओर से प्रकाश कारत के अलावा, सीपीएम के वरिष्ठ नेता हरकिशन सिंह सुरजीत, सीताराम येचुरी, सीपीआई के महासचिव एबी बर्धन, और सचिव डी राजा और अबनी रॉय बैठक में थे.
गतिरोध
पिछले दिनों केंद्र सरकार के भेल में अपनी हिस्सेदारी का 10 प्रतिशत शेयर बेचने के निर्णय को वामपंथी दलों ने साझा न्यूनतम कार्यक्रम का सबसे बड़ा उल्लंघन बताया.
वामपंथी दल भारत सरकार की मुनाफ़ा कमा रही सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में से एक भेल और अन्य नवरत्न कंपनियों के विनिवेश के सवाल को लेकर ख़ासे नाराज़ हैं.
हालांकि वामपंथी दलों को घाटे में चल रही कंपनियों के विनिवेश से कोई आपत्ति नहीं है.
भेल के विनिवेश को लेकर पिछले दिनों वामदलों ने सोनिया गाँधी को एक चिट्ठी भी लिखी थी जिसमें कहा गया था कि इसी के चलते वामपंथी दलों ने समन्वय समिति की बैठक में हिस्सा न लेने का निर्णय लिया है.
रविवार की बैठक के बाद भी वामपंथी दलों ने बैठक में शामिल होने के बारे में कुछ नहीं कहा है.