http://www.bbcchindi.com

रविवार, 26 जून, 2005 को 10:14 GMT तक के समाचार

यूपीए की बैठकों में नहीं जाने का फ़ैसला

वामपंथी दलों ने घोषणा की है कि वे युनाइटेड प्रोग्रेसिव फ़्रंट (यूपीए) की की समन्वय समिति की बैठक में जाना स्थगित कर रहे हैं.

इस संबंध में वामपंथी दलों ने यूपीए की अध्यक्ष सोनिया गाँधी को एक खुला पत्र लिखा है.

उनका कहना है कि समन्वय समिति की बैठकों में वामपंथियों के विरोध के बावजूद सरकार निर्णय लेना जारी रखे हुए है और वे इसका विरोध करते हैं.

भेल के विनिवेश और पेट्रोलियम पदार्थों की क़ीमतों में वृद्धि के मामले में वामपंथी दल सरकार से नाराज़ चल रहे हैं.

उल्लेखनीय है कि यूपीए के लिए बनाए गए न्यूनतम साझा कार्यक्रम (सीएमपी) पर चर्चा के लिए समन्वय समिति का गठन किया गया है.

यूपीए सरकार को वामपंथी दल बाहर से समर्थन दे रहे हैं लेकिन समन्वय समिति की बैठकों में हिस्सा लेते हैं.

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के मुख्यालय में हुई एक बैठक के बाद सीपीएम के महासचिव प्रकाश कारत ने कहा है कि सरकार जिस तरह फ़ैसले ले रही है उसके चलते वामपंथी दलों ने समन्वय समिति की बैठक में जाना स्थगित करने का फ़ैसला किया है.

बैठक में सीपीएम, सीपीआई, फ़ॉर्वर्ड ब्लॉक और आरएसपी के नेता मौजूद थे.

इन नेताओं के हस्ताक्षर से जो पत्र सोनिया गाँधी को लिखा गया है उसमें कहा गया है कि समय-समय पर होने वाली समन्वय समिति की बैठक में वामपंथी दलों ने न्यूनतम साझा कार्यक्रम के ऐसे कई मुद्दों को उठाया है जिसका असर सीधे आमआदमी और देश पर होता है.

लेकिन वामपंथी दलों से मतभेद के बावजूद सरकार अपने निर्णय पर क़ायम रही है.

भेल का मामला

बैठक के बाद पत्रकारवार्ता में वामपंथी दलों के नेताओं ने कहा कि वे सरकार की ओर से दिए गए इस तर्क से भी सहमत नहीं है कि विनिवेश और निजीकरण में फ़र्क है.

सीपीआई के महासचिव एबी बर्धन का कहना था, "विनिवेश ही बाद में निजीकरण का रास्ता खोलता है."

उल्लेखनीय है कि सरकार ने जब भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (भेल) के शेयर बेचने का फ़ैसला किया था तो वामपंथी दलों ने इसे न्यूनतम साझा कार्यक्रम का उल्लंघन बताते हुए इसका विरोध किया था.

उनका कहना है सीएमपी में कहा गया था कि नवरत्नों का विनिवेश नहीं किया जाएगा.

सोनिया गाँधी को लिखे पत्र में वामपंथी नेताओं ने कहा है कि वे सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि 51 प्रतिशत शेयर सरकार के पास रहेंगे जिसका मतलब है कि सरकार 49 प्रतिशत शेयर बेचने जा रही है. उनका कहना है कि इसके बाद दो प्रतिशत का महीन अंतर बचेगा और कंपनी निजीकरण की ओर बढ़ रही है.

वामपंथी दलों ने पेट्रोलियम पदार्थों की क़ीमतों में की गई बढ़ोत्तरी का भी विरोध किया है और 28 जून को इसके ख़िलाफ़ देशव्यापी प्रदर्शन की घोषणा की है.