शुक्रवार, 24 जून, 2005 को 13:34 GMT तक के समाचार
विश्वनाथ प्रताप सिंह
पूर्व प्रधानमंत्री
मेरा ख्याल है कि इंदिरा गाँधी को ग़लत सलाह दी गई. इमरजेंसी की ज़रूरत नहीं थी.
अदालत ने उन्हें अयोग्य क़रार दे दिया. यदि वो फिर चुनाव लड़ती तो भारी मतों से जीततीं. और वह सबसे अच्छा जवाब होता.
हम कांग्रेस के लोग छह महीने बाद यह महसूस करने लगे थे कि ग़लत हो रहा है.पहले सब चीजें सुधरने लगी थीं. ट्रेने समय पर चलने लगीं थीं और बाबू लोग दफ़्तर समय पर आने लगे थे.
लेकिन नेताओं की गिरफ़्तारियाँ हमें ठीक नहीं लगीं. जयप्रकाश नारायण और अन्य अनेक नेताओं को गिरफ़्तार किया गया था. मैं उस वक्त इंदिरा सरकार में वाणिज्य उपमंत्री था.
मैं गुजरात उपचुनाव के सिलसिले में वहाँ गया था और जब लौटा तो पता चला कि इमरजेंसी लगा दी गई है.
लेकिन जनवरी तक हमें अहसास होने लगा था कि ग़लत हो रहा है और इंदिराजी को जून तक इसका अहसास हो गया था लेकिन फ़ैसला लेने में वक्त लगा.
इस दौरान कई ग़लत बातें हुईं जिसमें सांसदों का कार्यकाल पांच से छह साल बढ़ाना शामिल है.
हम लोग इंदिराजी से मिले थे और कहा था कि ऐसा न करें.
इस दौरान नसबंदी को लेकर ज्यादतियाँ हुईं. उत्तर प्रदेश और बिहार में नसबंदी के कोटे की बात हुई तो हर मंत्री कहने लगा कि वह अकेले ही इसे पूरा कर देगा.
जैसे राजस्व मंत्री ने कोटा खुद लिया और उसे पटवारियों पर डाल दिया.
इसी तरह शिक्षा मंत्री ने शिक्षकों पर कोटा बांध दिया और यदि वे ऐसा नहीं करते थे तो थानेदार परेशान करता था.
जब इमरजेंसी हटी और चुनाव में हम गए तो वोटर कहते थे कि पहले अपनी नसबंदी करा लो फिर हमसे वोट माँगो.
जनता परेशान हो गई थी. इमरजेंसी हटाने के तुरंत बाद चुनाव हुए और लोगों ने अपना गुस्सा निकाला.
यह सब ग़लत सलाह की वजह से हुआ. और यह भी सही है कि बड़े लोगों की गलती छोटी तो होगी नहीं.
इंडिया इज़ इंदिरा जैसी बातें कहनेवाले लोग इंदिराजी की हार के बाद रातोंरात बदल गए.
हार के बाद इंदिराजी का साथ छोड़ चुके एक कैबिनेट मंत्री ने मुझसे कहा कि इमरजेंसी में ग़लत हुआ और मुझे भी अपने साथ आने को कहा.
लेकिन मैंने स्पष्ट कर दिया कि जब हम उनके साथ सत्ता में भागीदार थे तो इस समय साथ नहीं छोड़ सकते.
हार के बाद मैं इंदिराजी से मिला था और मैंने उनसे कहा था कि जनता में गुस्सा था, उसने थप्पड़ मारा है, सज़ा दी है लेकिन उसने दिल से नहीं निकाला है.
लेकिन इमरजेंसी को छोड़ दें तो इंदिरा गाँधी के साथ कई सकरात्मक बातें भी जुड़ी हुईं हैं.
उन्होंने भारत के नक्शे में सिक्कम को जोड़ा और बांग्लादेश बनवाकर दक्षिण एशिया का नक्शा ही बदल दिया.
(आशुतोष चतुर्वेदी से बातचीत पर आधारित)