शनिवार, 18 जून, 2005 को 10:36 GMT तक के समाचार
सुनील रामन
बीबीसी के दक्षिण भारत संवाददाता
ईरान के चुनावों से भारत का क्या रिश्ता हो सकता है भला. लेकिन एक रिश्ता फिर भी निकल आया.
उच्च शिक्षा के लिए ईरान से बड़ी संख्या में छात्र बंगलौर आते हैं. कुछ तो यहीं रहने भी लगे हैं.
पिछले दिनों छात्रों के एक समूह से बीबीसी की बात हुई तो पता चला कि युवा पीढ़ी अपने देश में बड़े बदलाव की उम्मीद लगाए बैठी है.
1979 में ईरान में हुई इस्लामी क्राँति ने ईरान और अमरीका के रिश्तों को इस क़दर बिगाड़ दिया था कि उच्च शिक्षा के लिए ईरानी छात्रों के अमरीका जाने पर रोक लग गई.
इसके बाद से इन छात्रों के लिए भारत एक मनपसंद देश बन गया और भारत में मेडिकल की पढ़ाई के लिए हज़ारों छात्र बंगलौर आने लगे. एक समय यहाँ पाँच हज़ार से अधिक छात्र थे.
आज जब ईरान में राष्ट्रपति पद के लिए महत्त्वपूर्ण चुनाव हुए हैं, ईरान के ये नागरिक अपने देश की राजनीतिक स्थिति पर नज़र रखे हुए हैं.
कुछ छात्रों से बंगलौर के 'सूफ़ी' रेस्टोरेंट में भेंट हुई. जहाँ ईरान की संस्कृति की झलक मिलती है. 1979 की क्राँति के बाद पैदा हुए यह नौजवान अपने देश में अधिक स्वतंत्रता चाहते हैं.
आयतुल्ला खुमैनी के नेतृत्व में ईरान में सत्ता परिवर्तन हुआ था. अमरीकी सरकार का समर्थन प्राप्त 'शाह' के ख़िलाफ़ देशव्यापी अभियान अमरीका विरोधी नारों पर आधारित था.
इस्लामी क्राँति लाने के लिए खुमैनी ने इरान के नागरिकों को अपने इतिहास और धर्म पर ज़ोर देने को कहा था. आज भी अमरीका और ईरान के रिश्ते तनावपूर्ण हैं.
पश्चिमी देशों जैसा नहीं
लेकिन 24 वर्षीय श्यावाश चाहते हैं कि ईरान का भाग्य तय कर रहे मुल्ला अमरीका के प्रति अपना नज़रिया बदलें. इसके लिए वे विश्व राजनीति में हुआ बदलाव का हवाला देते हैं.
दिलचस्प बात यह है कि ये नौजवान राष्ट्रपति मोहम्मद खातमी की सुधार नीतियों का समर्थन ज़रूर करते हैं लेकिन लोकतंत्र का पश्चिमी मॉडल नहीं चाहते.
कम्प्यूटर की पढ़ाई कर रहे 23 वर्षीय हादी ने कहा “मैं ईरान में अपनी राय रखने की स्वतंत्रता, मानवाधिकारों की रक्षा चाहता हूँ, लेकिन पश्चिचमी देशों में जिस तरह का खुलापन है मैं उसके पक्ष में नहीं हूँ.”
यह नौजवान चाहते हैं कि तेल के विशाल भंडारों पर बैठा ईरान, उच्च शिक्षा और रोज़गार के नए साधन पैदा करने पर ज़ोर दे.
डॉ नादेर, 20 साल पहले बंगलौर अपनी एमबीबीएस की पढ़ाई ख़त्म करने आए और फिर यहाँ बस गए.
41 वर्षीय नादेर ने ईरान में राजनीतिक सत्ता बदलते देखी है. वे कहते हैं “आप 30 साल पुराने नारे दोहराते नहीं रह सकते. आज का नौजवान जब “अमरीका मुर्दाबाद” और “इसराइल मुर्दाबाद” के नारे सुनता है तो वे उसे समझ नहीं सकता. वे हमसे पूछते हैं कि यह नारे क्यों लगाए जा रहे हैं.”
बढ़ती खाई
ईरान के मुल्लाओं के वहाँ के नौजवानों को न समझने के कारण, ईरान में सत्ता में बैठे लोगों और नई पीढ़ी के बीच खाई बढ़ती जा रही है.
मोहम्मद खातमी ने अपने आठ साल के कार्यकाल में सुधार की ओर क़दम ज़रूर उठाए लेकिन वो बहुतों को कम लगे. कई नए अख़बार, नई पार्टियों का जन्म ज़रूर हुआ लेकिन हादी जैसे कई नौजवान उनसे असंतुष्ट हैं.
हादी ने कहा “वायदे कई किए लेकिन उन पर खरे नहीं उतर पाए खातमी.”
श्यावाश ने खातमी की तारीफ की और उसे लगता है कि मुस्तफा मोइन जैसे नेता को राष्ट्रपति का चुनाव जीतना चाहिए.
“मोइन का रास्ता मुश्किलों से भरा है, लेकिन मुझे यक़ीन है कि सुधार के पथ से ईरान नहीं हटेगा. बदलाव ज़रूर होगा मगर उसमें समय लगेगा.”