सोमवार, 13 जून, 2005 को 10:33 GMT तक के समाचार
मोहन लाल शर्मा
दिल्ली
देश की सर्वोच्च जाँच संस्था सीबीआई सवालों के घेरे में है.
हाल ही में बोफोर्स मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने सीबीआई की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगाते हुए प्रमाणिक दस्तावेज़ों के अभाव में बोफोर्स कंपनी और हिंदुजा बंधुओं के ख़िलाफ़ सभी मामले रद्द कर दिए.
जस्टिस सोढ़ी ने अपने 38 पेज के आदेश में सीबीआई पर टिप्पणी करते हुए इसे भविष्य में और ज़िम्मेदारी से काम करने को कहा.
14 साल तक चले इस मुकदमें ने देश की राजनीति को हमेशा गर्म रखा. इसी मुद्दे ने राजीव गाँधी की सत्ता पलट दी थी और विश्वनाथ प्रताप सिंह को सत्ता में पहुँचाया था.
विश्वनाथ प्रताप सिंह कहते हैं. “हमें एक भी ऐसा केस नहीं याद आता जिसमें सीबीआई ऐसे किसी केस में सफल हुई हो. अब जाँच करने वाली एजेंसी की भी जाँच होनी चाहिए.”
जिन बोफोर्स दस्तावेज़ों को अदालत ने प्रामाणिक नहीं माना है उनको लेने के लिए पूर्व सीबीआई निदेशक जोगिंदर सिंह स्वीडन गए थे.
अदालत के फ़ैसले पर जोगिंदर सिंह कहते हैं “वो प्रमाणित कापियाँ ही थी. हर देश के अपने नियम होते हैं और कोई भी देश अपने मूल दस्तावेज़ नहीं देता और अदालत के फ़ैसले पर टिप्पणी करना उसकी अवमानना होगी.”
कई मामले
लक्खू भाई पाठक, सेंट किट्स मामला, जेएमएम रिश्वत कांड, जैन हवाला मामले से लेकर ऐसे तमाम उदाहरण हैं जिनमें परिणाम कुछ नहीं निकला.
इसके अलावा सुखराम से लेकर जयललिता तक के ख़िलाफ़ तमाम मामले अभी भी अलग-अलग अदालतों में चल रहे हैं.
ये सारे मामले बड़े-बड़े नामी गिरामी लोगों पर हैं लेकिन जब फ़ैसला आता है तो सबके सब बच निकलते हैं. सुप्रीम कोर्ट में वकील प्रशांत भूषण का मानना है “जब-जब बड़े लोगों के नाम आते हैं हमने हर बार देखा है कि सीबीआई राजनीतिक इशारों पर और कई बार भ्रष्ट उद्देश्य से काम करती है. पूरी न्याय प्रणाली चरमरा चुकी है.”
सवाल सीबीआई की कार्यप्रणाली पर है कि क्या वे ठीक-ढंग से चार्जशीट दायर नहीं करती.
वर्षों तक चलने वाली लंबी जाँच प्रक्रिया में मामले इतने लचर क्यों हो जाते हैं. सवाल न्याय प्रणाली पर भी है.
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जेएस वर्मा कहते हैं “अदालत में तो मामला आख़िर में आता है और जो सबूत पेश किए जाते हैं अदालत उसी पर फ़ैसला सुनाती है. अगर जाँच ठीक से नहीं हुई, अभियोग नहीं लगाए गए तो जज क्या करेगा.”
केंद्र का इशारा
सीबीआई पर केंद्र सरकार के इशारे पर चलने का आरोप लगता रहता है. हर राजनीतिक दल केंद्र पर सीबीआई के दुरुपयोग का आरोप लगाता है.
सीबीआई पर कितना राजनीतिक दवाब और हस्तक्षेप रहता है. 1990 में सीबीआई के निदेशक रह चुके राजेन्द्र शेखर का मानना है “ इसमें कोई शक नहीं कि हर कोशिश होती है कि जो एजेंसी है उनके ऊपर राजनीतिज्ञ हस्तक्षेप कर सकें. ये निदेशक पर निर्भर करता है कि वे कितना राजनीतिक हस्तक्षेप बर्दाश्त करे.”
विशेषज्ञों की राय है कि आज भी सीबीआई को अधिक स्वायत्ता की ज़रूरत है तभी बड़े मामलों के परिणाम सामने आएंगे.
बहरहाल मामले कहीं सीबीआई तो कहीं न्यायपालिका के चक्रव्यूह में फंस कर रह जाते हैं.
पर सीबीआई की भूमिका पर सबका मानना है कि इस संस्था की कार्यप्रणाली में तमाम सुधारों की ज़रूरत है, साथ ही इसे राजनीतिक हस्तक्षेप से निकलकर विश्वसनीय बनने के कारगर प्रयास करने होंगे.