शनिवार, 04 जून, 2005 को 12:48 GMT तक के समाचार
सुनील रामन
बीबीसी संवाददाता
"वो दिन रविवार नहीं होता तो मेरी दोनों लड़कियां, एक 16 साल की और एक 13 साल की, स्कूल में होती. जब विनाशकारी लहर आईं तो वो अपने को बचा नहीं सकीं."
ये कहना है मरिअम्मा का.
केरल के तटीय ज़िले, कोल्लम के सूनामी प्रभावित क्षेत्र, अल्लापाड़ पंचायत में मरिअम्मा जैसी कई महिलाएँ पाँच महीने बाद भी अपने दुख से उबर नहीं पाई हैं.
जैसे ही मरिअम्मा से 26 दिसंबर, 2004 की तबाही के बारे में सवाल करें, उनकी आंखें भर आती हैं.
अपने बच्चों को खोने के दुख ने इन महिलाओं के जीवन को प्रभावित किया है.
टीन की चादरों से बने एक कमरे के मकानों के बाहर या तो ये महिलाएँ गुमसुम बैठी रहती हैं और या फिर अलग बैठकर रोती रहती हैं.
रेखा, जो 26 वर्षीय हैं, वो दिन भुला नहीं पा रही हैं, जब उनकी डेढ़ साल की लड़की सूनामी लहरों में बह गई.
रेखा कहती हैं, "मैं लिमशा कि लिए दवाई लेने उठी कि तभी मेरे कमरे में पानी आ गया. मेरे मकान की छत मेरे ऊपर आ गिरी और विनाशकारी लहरें मेरी आँखों के सामने मेरी बेटी को बहा ले गई."
'वक्त लगेगा'
स्थानीय अस्पतालों के चिकित्सक औऱ मनोवैज्ञानिक इस शिविर में आकर इन महिलाओं का उपचार कर रहे हैं.
ऐसे ही एक चिकित्सक ने बताया, "बहुत समय लगेगा. जिन औरतों के बच्चे सूनामी की तबाही में मारे गए, वो गहरे सदमे में हैं. इन्हें इससे बाहर निकलने में बहुत समय लगेगा."
40 वर्षीय गीथास एक मछुआरा है और दोनों बेटियों को खोने के बाद वो फिर से औलाद चाहता है. पर उसकी पत्नी, मरिअम्मा को अपने बच्चों के खोने का इतना दुख है कि वो इस बारे में सोच भी नहीं पा रही है.
इस शिविर में कई ऐसी महिलाएँ हैं, सूनामी लहरों जिनके बच्चे उनसे छीन लिए हैं.
शिविर में हमारी मुलाक़ात सुलधा से हुई जिनकी दोनों पोतियाँ सूनामी लहरों का शिकार बन गईं.
सुलधा अपनी पोतियों की तस्वीर हाथ में लेकर घर से बाहर खड़ी रो रही थीं.
वो बताती हैं, "मेरी बहू ने नसबंदी करा रखी है पर अब वह फिर से औलाद चाहती है. वो पास के अस्पताल में ऑपरेशन कराने गई हुई है."
केरल स्टेट मेंटल अथॉरिटी का कहना है कि सूनामी पीड़ित माताओं को अपने सदमे से उबरने में अभी वक्त लगेगा.
उनका मानना है, "बेऔलाद औरतें अगर एकबार फिर से माँ बनें तो उनके दुख पर काफ़ी हद तक काबू पाया जा सकेगा."
पर इसमें समय लगेगा और तब तक इन महिलाओँ को उपचार के सहारे चलना होगा.