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गुरुवार, 19 मई, 2005 को 14:08 GMT तक के समाचार

मोहम्मद सलीम
सीपीएम नेता

'सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ अच्छी पहल'

इस सरकार की कुछ अच्छी बातें भी है लेकिन जैसी उम्मीद की थी वैसा भी नहीं है.

सांप्रदायिकता की बात करें तो उस पर पूरे देश में नियंत्रण है और कोई भी सांप्रदायिक तत्व उभर कर आने की हिम्मत नहीं करेगा, इसके लिए सरकार ने पहल की है.

आरएसएस की घुसपैठ अनके जगहों पर थी उसको हटाने में जो पहल होनी चाहिए थी, वह नहीं हुई.

विदेश नीति की दिशा में बेशक बहुत अच्छे काम हुए हैं. पिछली एनडीए की सरकार स्वदेशी के नाम पर आई थी, लेकिन अमरीकी साम्राज्य के पिछलग्गू की तरह काम कर रही थी.

वह रणनीतिक गठजोड़ के नाम पर अमरीका, इसराइल और भारत को एक साथ जोड़ने की कोशिश कर रही थी.

यह आज़ादी की लड़ाई से लेकर बाद तक हमारी देश की परंपरा कभी नहीं रही.

एक साल के शासनकाल के दौरान विदेश नीति की एक नई पहल सामने आई है.

इसमें भारत-पाकिस्तान, भारत-चीन और एशिया अफ्रीका सभी से बेहतर रिश्ते की कोशिशें जारी हैं. रूस और चीन के भारत से क़रीबी संबंध बनाए रखने के भी प्रयास चल रहे हैं.

तेज़ी से काम हो

देश में ग़रीबी है और बेरोज़गारी है, लोग परेशान हैं. एनडीए सरकार इन तबक़ों को भूल गई थी.

हमारी आपत्ति है कि न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर उतनी तेज़ी से काम नहीं हो पा रहा है जिसे वामपंथी हमेशा दोहराते रहे हैं.

ग्रामीण और शहरी बेरोज़गारों को नौकरी देने के बारे में सरकार ने घोषणा की है.

लोगों को उम्मीद है और हम भी यह चाहेंगे कि सरकार इस पर कुछ अमल करे.

यदि विपक्ष को देखें तो मेरा मानना है कि विपक्ष की भूमिका अदा करने के लिए भाजपा अब भी तैयार नहीं हैं.

एनडीए में जितने लोग जुटे थे, वे सब सरकार बनाने के लिए जुटे थे.

और अब जब वे सत्ता में नहीं हैं तो उन्हें नहीं मालूम कि वे कौन सी भूमिका अदा करेंगे.

वे जनता की बात नहीं कर रहे हैं, उनके पास कोई मुद्दा नहीं है, बहस के लिए तैयार नहीं है.

भारतीय जनता पार्टी और एनडीए को खुद अपनी ओर देखना पड़ेगा कि जनता ने क्या भूमिका अदा करने की ज़िम्मेदारी उन्हें दी है और वे किस तरह से अपनी ज़िम्मेदारी वहन कर रहे हैं.

इन सब बातों को देखते हुए मैं इस सरकार को दस में से साढ़े छह अंक दूँगा.

(आशुतोष चतुर्वेदी से बातचीत पर आधारित)