शनिवार, 14 मई, 2005 को 07:16 GMT तक के समाचार
शालिनी जोशी
बद्रीनाथ धाम को पूरे साल खोलने के उत्तरांचल सरकार के प्रस्ताव का धर्माचार्य और परंपरावादी कड़ा विरोध कर रहे हैं.
राज्य सरकार जहां पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए बद्रीनाथ यात्रा को पूरे साल चलाना चाहती है वहीं विरोधियों का कहना है कि ये शास्त्रों और धार्मिक परंपरा का उल्लंघन होगा.
आदि शंकराचार्य ने 10 वीं-11वीं सदी में हिंदू धर्म को एकजुट करने के लिए भारत की चारों दिशाओं में जिन चार धामों की स्थापना की थी बद्रीनाथ उनमें से एक है.
गढ़वाल हिमालय में बद्रीनाथ करीब 10,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है.
यहां भगवान विष्णु की पूजा होती है. बहुत ज्यादा हिमपात होने के कारण बद्रीनाथ मंदिर के कपाट साल के छह महीने बंद कर दिये जाते हैं.
साल के छह महीने कपाट बंद रखने और छह महीने खोलने की ये परंपरा सैकड़ों सालों से चली आ रही है.
मंदिर को खोलने और बंद करने की प्रक्रिया शास्त्र सम्मत विधि से भारी धार्मिक अनुष्ठान और लोकरीतियों के साथ संपन्न की जाती है.
इस दौरान भगवान बद्रीविशाल की पूजा भी जोशीमठ में की जाती है. सर्दियों में जब मंदिर के कपाट बंद रहते हैं.
कड़ाके की ठंड और बर्फबारी के दौरान यहां रहनेवाले सारे लोग भी अपने घर-दुकानें बंद करके पांडुकेसर जैसे कम ठंडवाले निचले इलाक़ों में चले आते हैं.
बर्फबारी और ग्लेशियर के टूटने से यहां के रास्ते भी बंद हो जाते हैं लेकिन अब राज्य सरकार का चाहती है कि ये रास्ता पूरे साल खुला रहे ताकि ज्यादा से ज्यादा सैलानी यहां आ सकें.
सरकार का तर्क
इस संबंध में उत्तरांचल के पर्यटन मंत्री टीपीएस रावत का कहना है,” ये यात्रा मार्ग ऐसा है कि पर्यटक यहां आकर बद्रीनाथ के साथ-साथ गढ़वाल हिमालय के दर्शन कर सकते हैं. लिहाजा सड़कों का रखरखाव करके इस रास्ते को सर्दियों में भी खोला जा सकता है.”
लेकिन ये प्रस्ताव यहां के मठाधीश और पुरोहितों के गले नहीं उतर रहा.
बद्रीनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी बद्रीप्रसाद नंबूदरी का कहना है,“ये विचार पवित्र धाम की धार्मिक भावनाओं पर चोट करने के प्रयास से ज्यादा कुछ नहीं है.”
चेतावनी के अंदाज में वो कहते हैं,” अगर हम सदियों से चली आ रही धार्मिक व्यवस्थाओं का उल्लंघन करते हैं तो हमें हमें इसका खामियाजा भुगतने को भी तैयार रहना चाहिए.”
वेदपाठी पंडित भुवनचंद उनियाल की राय है,'' बद्रीविशाल तपस्या और धार्मिक आस्था की जगह है,एन्जॉयमेंट के लिए नहीं. जिन्हें हिमालय और बर्फबारी में मौजमस्ती करनी हो वो मसूरी और नैनीताल जाएं.”
हर साल करीब 5 से 7 लाख तीर्थयात्री बद्रीनाथ के दर्शन के लिए आते हैं.
सरकार का अनुमान है कि अगर यहां के आसपास के दर्शनीय स्थलों जैसे भारत-चीन सीमा के गांव, महाभारत काल की व्यास गुफा और सरस्वती नदी के उदगम को शुद्ध पर्यटन के लिहाज से विकसित किया जाए तो सैलानियों की संख्या दोगुनी हो सकती है.
लेकिन शायद यहां आनेवाले तीर्थयात्री भी इसे लेकर बहुत उत्साहित नहीं हैं.
चेन्नई से बद्रीनाथ आए मन्नुभाई दवे कहते हैं, “साल भर हम कपाट के खुलने का इंतजार करते हैं. अगर साल भर लोग यहां आने जाने लगेंगे तो यहां की धार्मिक पवित्रता और हम जैसे लोगों की भावना को ठेस पंहुचेगी.”
हांलाकि कुछ स्थानीय निवासी और व्यापारी सरकार के इस प्रस्ताव से उत्साहित भी हैं.
इनमें से एक रमेश डिमरी कहते हैं,” बद्रीनाथ धाम के खुले रहने से साल के छह महीने जो हमारा काम बिल्कुल ठप्प हो जाता है लोगों के आने-जाने से कुछ आमदनी तो होगी.”
वहीं रजनीश कौंसवाल कहते हैं,” मंदिर खुले या न जिसकी आस्था होगी वो बंद कपाट के दर्शन करके भी जा सकता है. यहां पर्यटन विकास की बहुत संभावनाएं हैं.”
हांलाकि देवेंद्र सती जैसे बुजुर्ग का कहना है कि, “एसी कमरों में बैठ कर ऐसे फैसले करनेवालों को यहां पड़नेवाली ठंड का अंदाजा नहीं है. मुझे नहीं लगता कि सर्दियों में यहां कोई आएगा भी.”
राज्य सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि मंदिर के कपाट भले न खुलें. बद्रीनाथ यात्रा को साल भर चलाने के प्रति वह गंभीर है.
इसके लिये केंद्रीय रक्षा मंत्रालय से स्नो कटर और 5 करोड़ भी मंजूर हो गए हैं.
ये देखने लायक बात होगी कि सरकार का ये प्रस्ताव कितना व्यवहारिक साबित हो पाता है क्योंकि अंतत: स्थानीय सहयोग भी जरूरी होगा.