http://www.bbcchindi.com

शुक्रवार, 29 अप्रैल, 2005 को 17:28 GMT तक के समाचार

फ़ैसल मोहम्मद अली
बीबीसी संवाददाता, भोपाल

शरीयत जागरुकता अभियान पर विचार

भोपाल में शनिवार से शुरू होने वाली अपनी दो दिनों की बैठक में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड मुस्लिम समुदाय को इस्लामी रीति रिवाज़ और क़ानून से वाकिफ़ करवाने के लिए एक 'शरीयत जागरुकता अभियान' पर विचार करेगा.

भारत के 18 करोड़ मुसलमानों की इस प्रतिनिधि संगठन में अयोध्या स्थित विवादित बाबरी मस्ज़िद- राम जन्म भूमि विध्वंस मामले में चल रहे दीवानी और फ़ौजदारी मुकदमों पर भी चर्चा होगी.

बोर्ड मॉडल निकाहनामे, बोर्ड द्वारा शादी और तलाक़ से जुड़े मामले पर एक निर्देशिका पत्र को भी आमसभा के सामने रखेगा.

यह पत्र 41 सदस्यों वाली कार्यकारिणी द्वारा पहले ही स्वीकृत किया जा चुका है.

निकाह, तलाक़, तलाक़ के बाद पत्नी और बच्चे का ख़र्च पति द्वारा दिए जाने जैसे विषयों पर इस्लामी क़ानून का उल्लेख करने वाले इस निकाहनामे को स्वीकृति मिल जाने की पूरी उम्मीद है.

लेकिन तलाक़ के मसले, ख़ासतौर पर पति द्वारा पत्नी को एक ही बार में तीन तलाक़ कहने की सूरत में उसे एक तलाक़ माना जाए या फिर उसे तीन तलाक़ मान लिया जाए.

चूंकि इस्लामी क़ानून में यह भी ज़िक्र है कि तीन तलाक़ तीन महीने की अवधि में यानी एक-एक महीने पर एक तलाक़ दिया जाए.

इस बात को लेकर बोर्ड के सदस्यों में अब भी मतभेद है.

बोर्ड की आमसभा और कार्य समिति के आमंत्रित सदस्य हलीम सल्फ़ी का कहना है, “ मुसलमानों का एक समुदाय ख़ासतौर पर शिया और अहल ए हदीस का कहना है कि क़ुरान में चूंकि वक्फ़े के साथ ही तलाक़ देने का ज़िक्र है. लेकिन कुछ लोग दूसरे ख़लीफ़ा हज़रत उमर के समय एक ही बार में तीन तलाक़ की इजाज़त पर ज़ोर देते हैं.”

लेकिन बोर्ड के महासचिव निज़ामुउद्दीन एक ही बैठक में तीन तलाक़ कह देने और तलाक़ हो जाने की बात को सही बताते हैं.

उनका कहना है, “क़ुरान में ऐसी बातों का जिक़्र करने वाले ग़लत कह रहे हैं. क़ुरान में साफ़ है कि तुम एक या तीन बार तलाक़ कहो, तलाक़ हो जाएगा.”

विवाद का विषय

शिया समुदाय के सदस्य भी इस मामले में मॉडल निकाहनामे में मौज़ूद सूझाव यानी एक बार में तीन तलाक़ की बात से इत्तफ़ाक नहीं रखते.

लेकिन वह अपनी राय आम नहीं करना चाहते.

ख़ासतौर पर तब जबकि हाल ही में शिया समुदाय के कुछ लोगों और चंद महिलाओं ने अपनी अलग-अलग संस्थाएं बना भी ली और यह मामला मुस्लिम समुदाय में फूट के तौर पर सामने आया था.

चर्चा में मौज़ूद मॉडल निकाहनामा बंगलौर अधिवेशन के समय से ही विवादों के घरे में रहा है.

कुछ प्रगतिशील सदस्यों ने इसमें निकाह के साथ ही औरत को मेहर दिए जाने और औरतों को तलाक़ का हक बिना काज़ी के पास गए ही मिलने की बात की. फिर इसमें तब्दीलियाँ की गईं.

इसमें अब नई बात सिर्फ़ काज़ी के सामने जाकर झगड़े के निपटारे की है. लेकिन अचरज की बात यह है कि दकियानूस समझा जाने वाला वहाबी समुदाय इसमें प्रगतिशील पहलू लाने को तैयार हैं जबकि बोर्ड ऐसा नहीं चाहता.

हालाँकि वह ख़ुद मुस्लिम प्रगतिशीलता का दावा करता रहा है.