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गुरुवार, 21 अप्रैल, 2005 को 11:48 GMT तक के समाचार

आशुतोष चतुर्वेदी
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

अटल बिहारी वाजपेयी: बयान दर बयान

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी एक बार फिर अपने बयान से पलट गए और उन्होंने स्पष्टीकरण जारी कर दिया कि आडवाणी के संबंध में उनके बयान का गलत अर्थ लगाया.

वाजपेयी ने कहा कि वो चाहते हैं कि आडवाणी पद पर बने रहें.

इसके पहले वाजपेयी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख केएस सुदर्शन की राय का समर्थन किया था.

उन्होंने कहा था कि भाजपा के अधिक उम्र के नेताओं को सेवानिवृत हो जाना चाहिए.

वाजपेयी ने पहले कहा था कि वे ख़ुद तो किसी पद पर नहीं हैं और पद से हटने का फ़ैसला पार्टी अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी को और पार्टी को करना है.

प्रेक्षकों का मानना है कि वाजपेयी का अपने बयानों से पलटना कोई नई बात नहीं है.

गुजरात

लोकसभा चुनावों के एक महीने बाद वाजपेयी ने जब चुप्पी तोड़ी तो भाजपा और संघ परिवार में खलबली मच गई.

गुजरात दंगों के दौरान वे अधिकतर समय ख़ामोश दिखे लेकिन संसद में काँग्रेस-वाम दलों के काम रोको प्रस्ताव पर नरेंद्र मोदी सरकार का बचाव करते नज़र आए.

उन्होंने अलग-अलग मौक़ों पर भिन्न बयान दिए.

''यह कहना मुश्किल है कि चुनावों में भाजपा की हार के सभी कारण क्या थे. लेकिन गुजरात हिंसा का नतीजा था कि हम चुनाव हार गए. ''(13 जून, 2004)

''हार की अधिकतम ज़िम्मेदारी मैं लेता हूँ क्योंकि चुनाव मेरे ही नाम पर लड़े गए थे. इसका प्रायश्चित्त मैं ही करूँगा. ''(18 जून, 2004)

अयोध्या

अयोध्या मुद्दे पर उन्होंने कई बार अपने बयान बदले और एकदम उलटी बातें कहीं.

बाबरी मस्जिद गिराए जाने को 'दुर्भाग्यपूर्ण' बताने वाले वाजपेयी ने डटकर उसका विरोध नहीं किया.

तीन भाजपा सरकारों के बर्ख़ास्त किए जाने पर वे उसके विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए.

उन्होंने अपने रुख़ में कई बार परिवर्तन किया.

''राम जन्मभमि पर मंदिर का निर्माण हमारे राष्ट्रीय गौरव के लिए आवश्यक है. '' ( अप्रैल,1991)

''बाबरी मस्जिद ढहाया जाना मेरे जीवन का सबसे दुखद दिन है.''( दिसंबर, 1993)

''भले ही भाजपा को पूर्ण बहुमत मिल जाए मेरी सरकार अयोध्या मुद्दे को नहीं उठाएगी.'' (अगस्त,1999)

''अयोध्या एजेंडा अब भी अधूरा है, राम जन्मभूमि आंदोलन राष्ट्रीय भावनाओं का प्रतीक है.''
(दिसंबर,2000)

मुस्लिम

वाजपेयी की छवि उदारवादी नेता की है. लेकिन अहम मुद्दों और मौक़ों पर उन्होंने कभी बुलंद आवाज़ में कट्टपंथियों को आड़े हाथों नहीं लिया.

उन्होंने अल्पसंख्यकों के बारे में अलग-अलग बातें कहीं.

''मुस्लिम भाइयों के दिमाग में आशंका पैदा करने के लिए अभियान छेड़ा गया है.'' (जनवरी,2001)

''हमें सरकार बनाने के लिए मुसलमानों के समर्थन की ज़रूरत नहीं है.'' (उप्र में, 2002)