शनिवार, 09 अप्रैल, 2005 को 16:15 GMT तक के समाचार
रेणु अगाल
बीबीसी संवाददाता
भारत-चीन संबंध कई पड़ावों से गुज़रे हैं. हिंदी-चीनी भाई-भाई से लेकर, दुश्मन नंबर-1 तक.
इस सबके बीच दोस्ती की बातें हुई, व्यापार बढ़ा, यानी जितने उतार-चढ़ाव दो देशों के रिश्तों के बीच आ सकते हैं आए.
दोनों देशों के बीच सीमा विवाद सबसे पेचीदा मसला है. इस पर दोनों देशों का साझा कार्यबल काम कर रहा है. दोनों देशों ने इस पर बात करने के लिए विशेष प्रतिनिधि भी चुने हैं.
पर चीन आज भी कहता है कि भारत ने अवैध रूप से उसकी 90 हज़ार 59 किलोमीटर भूमि पर कब्ज़ा किया हुआ है वही भारत अक्साइचिन और अरूणाचल सीमा में चीन के कब्ज़े की ओर ध्यान आकृष्ट करना नहीं चूकता.
अब जिन सिद्धांतों पर बातचीत हो उसका खाका तैयार किया जा रहा है. चीन मामले के विशेषज्ञ मनोरंजन मोहंती कहते हैं- ‘‘सिद्धांतों की घोषणा की जाएगी. और ये सिद्धांत महत्वपूर्ण है, क्योंकि ज़मीन पर तो शांति है और इसी सिद्धांत के आधार पर नक्शों में दर्शाया जाएगा कि वास्तविक सीमा नियंत्रण रेखा को सीमा के रूप में हम देखें. क्योंकि विवाद इसी पर है कि नक्शे पर और ज़मीन में असल नियंत्रण रेखा कहाँ है साथ ही सीमा के रहने वाले लोगों की संवेदनाओं का भी ध्यान रखा जाएगा. ’’
चीनी रूख़
चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ का कहना है कि जब तक दोनों देश आपसी समझ दिखाए, दूसरे के मत का और इतिहास का आदर करे और आज की वास्तविकता को समझें तो बराबरी के आधार पर सीमा विवाद का हल भी मिल सकता है.
सभी मानते हैं कि इस दिशा में अभी बहुत काम की ज़रूरत है. इंस्टीट्यूट ऑफ चाइनिज स्टडिज के एमरेट्स प्रोफेसर और पूर्व राजनयिक विनोद खन्ना कहते हैं कि दोनों देशों के लोग आज की वास्तविकता जानते हैं और उनकी अपेक्षाए भी कम है.
वे कहते हैं, ‘‘सीमा का जहाँ तक सवाल है भारत में लोग मानने लगे हैं कि अक्साइचिन लौट के आने वाला नहीं है और न ही उसके लिए लड़ने वाले हैं. जहाँ तक भारत के मुख्य राजनीतिक दलों का सवाल है उनमें ये सहमति है कि वास्तविक सीमा नियंत्रण रेखा को ही थोड़े बहुत अंतर के साथ स्वीकार करना पड़ेगा. अगर चीन समझे कि भारत उसे अरूणाचल प्रदेश दे देगा और भारत सोचे की चीन उसे अक्साइचिन दे देगा तो ये तो मृगतृष्णा होगी."
मानदंड
आज की तारीख में वर्ष 2003 में वाजपेयी यात्रा के दौरान दोनों देशों के रिश्तों और सहयोग के जो मानदंड तय किए गए थे उन्हीं पर सरकारें आगे चल रही है.
चीन और भारत दोनों व्यापार और आर्थिक सहयोग पर विशेष ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. 10 साल पहले और आज दोनों देशों के बीच व्यापार में ज़मीन आसमान का फर्क आ गया है.
2004 में दोनों देशों के बीच लगभग 14 अरब डालर का व्यापार हुआ. अब वह भारत का दूसरा बड़ा व्यापार साझीदार है.
अब से कुछ साल पहले तक भारत में व्यापारियों को डर था कि चीन भारत के व्यापार करेगा तो उनका काम-धंधा ठप्प पड़ जाएगा.
विकासशील देशों पर शोध और सूचना एकत्र करने वाली देना बैंक के एक शोध के अनुसार चीन और भारत 2020 तक विश्व के दूसरे और तीसरे नंबर की अर्थव्यवस्ता बन जाएंगे.
संस्था के डॉ. नागेश कुमार कहते हैं ‘‘चीन और भारत की जनसंख्या मिलकर विश्व की एक तिहाई जनसंख्या से ज़्यादा हो जाती है और ये दोनों अर्थव्यवस्था अगर इसी तेज़ी से बढ़ती रही तो अगले 20 सालों में दुनिया की तीन सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में भारत और चीन शामिल होंगे.’’
जहाँ तिब्बत जैसे मुद्दों पर दोनों देशों में आपसी समझ विकसित हुई है वहीं पूर्वोत्तर भारत में अलगाववादियों को समर्थन, वर्मा समेत नेपाल और पाकिस्तान को मदद, दोनों देशों के बीच टकराव का कारण रहा है.
पाकिस्तान और चीन के निकट सहयोग भारत के लिए चिंता का विषय रहा है पर भारत-चीन संबंधों में सुधार के मद्देनज़र क्या चीन-पाकिस्तान संबंधों में बदलाव आएगा?
पूर्व राजनयिक विनोद खन्ना कहते हैं- ‘‘हमें चीन से कहते रहना है कि अगर आपके पाकिस्तान से सामान्य संबंध रहते हैं तो हमें कोई एतराज़ नहीं. पर उसमें अगर परमाणु और मिसाइल पक्ष से भारत के खिलाफ़ नीतियों में उसका समर्थन कर रहे हैं तो इसका बुरा असर पड़ सकता है. चीन पाकिस्तान से अपनी मैत्री को कम तो नहीं करेगा पर अब लगभग एक दशक से ये नीति हो गई है कि एक देश से अच्छे संबंधों का असर दूसरे देश से संबंधों पर नहीं पड़ने दिया जाएगा.’’
चीन और भारत के रिश्तों को बेहतर बनाना जहाँ दोनों देश चाहते हैं वहीं इन दो बड़ी आबादी वाले देशों के बदलते और सुधरते संबंधों पर दुनिया भर की नज़र है.