गुरुवार, 07 अप्रैल, 2005 को 19:35 GMT तक के समाचार
श्रीनगर से विनोद वर्मा
बीबीसी संवाददाता
भारत और पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के लोग जब अपनों से मिले तो ख़ुशी के आँसू थम नहीं पाए.
लाहौर हाईकोर्ट के एक रिटायर्ड जज सैयद तारिक़ हुसैन भी ऐसे ही लोगों में से एक थे जो 50 साल बाद भारतीय कश्मीर पहुँचे.
वे मात्र 13 साल के थे जब सन 1950 में श्रीनगर छोड़ पाकिस्तानी कश्मीर चले गए थे.
बुधवार को मुज़फ़्फ़राबाद से जब उनकी बस भारतीय कश्मीर में सलामाबाद पहुँची तो वहाँ मानों किसी सिनेमा सा दृश्य बन गया.
आँसू रुक नहीं पाए
वे मुज़फ़्फ़राबाद में रहते हैं और गुरुवार को भारत-पाकिस्तान नियंत्रण रेखा पार करके आई पहली बस के यात्रियों में से एक थे.
सैयद तारिक हुसैन ने बस से उतरते ही जब अपनी भाँजियों को देखा तो गले लगा लिया और उनकी आँखों से आँसू बह निकले.
विभाजन ने भाई-बहन को अलग कर दिया था और वे अपनी भांजियों से कभी मिले ही नहीं थे.
हालांकि दूसरे यात्री शुक्रवार की सुबह अपने नाते रिश्तेदारों से मिलेंगे लेकिन हुसैन की भांजियाँ सलामाबाद ही पहुँच गईं थीं.
श्रीनगर से जाने के बाद पाकिस्तान ही सैयद तारीक़ हुसैन का घर बन गया और वहाँ उन्होंने ख़ूब तरक्की की और लाहौर में जज बन गए.
लेकिन उनका कहना था, "मै कभी भी अपने पूर्वजों का घर नहीं भूला. मुझे अपने शहर का हर कोना, कूचा और गली याद है."
मुज़फ़्फ़राबाद से आने वाली बस के तीस यात्रियों के लिए ये बहुत ही भावुक घड़ी थी.
नियंत्रण रेखा से श्रीनगर तक के 160 किलोमीटर के सफ़र के दौरान लगभग हर गाँव और नगर को लोगों ने तालियाँ बजाकर और गाने गाकर बस का स्वागत किया.
ऐसे ही लोगों में मौजूद एक महिला शग़ुफ़्ता का कहना था, "आज एक ऐतिहासिक दिन है और मैं चाहती थी कि यहाँ पहुँच सकूँ. ये हमारे महमान है, हमारे भाई-बहन हैं."