मंगलवार, 05 अप्रैल, 2005 को 11:00 GMT तक के समाचार
ऐंड्रू व्हाइटहेड
बीबीसी संवाददाता
मुज़फ़्फ़राबाद में आज भी इस सड़क को श्रीनगर रोड के नाम से जाना जाता है, लेकिन अजीब बात है कि पिछले पाँच दशकों से कोई भी व्यक्ति इस रास्ते से श्रीनगर नहीं गया.
अगर आप कश्मीर घाटी का नक्शा देखें तो झेलम नदी एक नीले धागे की तरह दिखती है जो कश्मीर के सभी मुख्य शहरों को छूती हुई गुज़रती है.
झेलम नदी अनंतनाग और श्रीनगर से होती हुई बारामूला तक जाती है इसके बाद शुरू होता है पाकिस्तानी हिस्सा, मुज़फ़्फ़राबाद में नीलम नदी से मिलने के बाद वह पाकिस्तानी पंजाब के मैदानों में उतरती है.
इसी झेलम नदी के साथ चलने वाली सड़क कश्मीर घाटी और बाक़ी दुनिया के बीच सबसे महत्वपूर्ण मार्ग रहा है, भारत की आज़ादी के समय तक यही एक सड़क थी जो साल भर खुली रहती थी.
कश्मीर घाटी तक जाने वाले बाक़ी सारे रास्ते जो कि संकरे पहाड़ी दर्रों से होकर गुज़रते हैं, सर्दी के दिनों में बर्फ़बारी की वजह से बंद हो जाते हैं.
हमले का गवाह
इसी सड़क से 1947 में अक्तूबर में हज़ारों कबायली हमलावर आए थे और श्रीनगर की बाहरी हिस्सों तक पहुँच गए थे, तब घबराकर कश्मीर के राजा ने भारत से सहायता की माँग की थी.
भारतीय सैनिकों ने हमलावरों को झेलम की घाटी में खदेड़ दिया, लड़ाई बंद हो गई लेकिन इस लड़ाई का व्यावहारिक परिणाम ये हुआ कि कश्मीर का विभाजन हो गया.
और यह सड़क तब से हमेशा के लिए बंद हो गई.
कुल मिलाकर, यह सड़क लगभग एक सौ साल पुरानी है और अपने जीवनकाल के आधे हिस्से में कभी पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं हुई है.
शुरूआत
एक ईसाई मिशनरी ने 1890 में मौजूदा पाकिस्तान की तरफ़ से कश्मीर पहुँचने का विवरण दिया है, उन्होंने लिखा है कि रावलपिंडी से घोड़ागाड़ी पर बैठकर बारामूला तक की यात्रा की, इसमें उन्हें तीन दिन लगे. इसके बाद नाव से श्रीनगर पहुँचने में उन्हें तीन दिन और लगे.
सड़क बनने के बाद यह यात्रा सात-आठ घंटे में करना संभव हो गया और यह घाटी के लोगों के लिए जीवनरेखा बन गई लेकिन बहुत दिनों तक कश्मीर के लोगों को यह सड़क नसीब नहीं हुई.
इस सड़क पर आख़िरी बस शायद 21 अक्तूबर को 1947 को चली थी, एक ब्रितानी राजनयिक ने कबायली हमले के दौरान मुज़फ़्फ़राबाद से श्रीनगर की यात्री की, उन्होंने बस में बैठकर अपनी खिड़की से हथियारबंद कबायलियों की टोलियों को जाते हुए देखा.
उन्होंने लिखा है कि "जिस बस से मैं श्रीनगर गया था वह आख़िरी बस थी जिसके बाद कबायली हमलावरों ने सड़क को बंद कर दिया."
24 अक्तूबर 1947 के हिंदुस्तान टाइम्स ने लिखा, "कश्मीर घाटी पूरी दुनिया से कट गई है."
अनुभव
कुछ वर्ष पहले जब मैं इस सड़क पर पहुँचा तो पाकिस्तानी सैनिक मुझे अपने काफ़िले के साथ चकोटी तक ले गए जो पाकिस्तान की अंतिम सैनिक चौकी है, यहाँ से मैं नियंत्रण रेखा के दूसरी ओर तैनात भारतीय सैनिकों को देख सकता था लेकिन उस तरफ़ जा नहीं सकता था.
कुछ दिनों बाद मैं नियंत्रण रेखा के भारतीय सिरे पर पहुँचा, भारतीय सेना की चौकी से चकोटी को देखना अलग तरह का अनुभव था, चकोटी इतना नज़दीक था कि मैं मस्जिद से अज़ान की आवाज़ सुन सकता था.
मैं जिस जगह को अपनी आँखों से देख सकता था वहाँ पहुँचने में मुझे 72 घंटे लगे, तीन एयरलाइनों को टिकट के पैसे देने पड़े.