शुक्रवार, 01 अप्रैल, 2005 को 05:04 GMT तक के समाचार
फ़ैसल मोहम्मद अली
बीबीसी संवाददाता, भोपाल
मध्यप्रदेश के झाबुआ, धार और खरगौन क्षेत्र के सप्ताहिक हाट मेले की शक्ल अख्तियार कर लेते हैं.
इन मेलों में एक और रंग घुला होता है-प्रेम का रंग.
भगोरिया के नाम से जाने जाने वाले इन मेलों में युवक-युवतियाँ एक दूसरे से अपने प्रेम का इज़हार करते हैं.
मेले के शोर शराबे, ढोल और मांडर के थापों के बीच यहाँ हर ओर रंग ही रंग होता है.
लाल, गुलाबी, हरे, पीले रंग के फैंटे यानी पगरियाँ. कानों में चाँदी की लरें, कलाइयों और कमर में कड़े और कंडोरे पहने पुरुष.
कुछ के कमर में इनकी जगह घुंघरू बाँधते हैं जिनकी थाप शोर-शराबे के बीच भी साफ़ सुनाई पड़ती है.
महिलाओं के जमुनिया, कथई, काले और ब्लू रंग की भिलोंडी लहंगे, पोल्का और ओढनियां एक बहार सी ला देते है.
झाबुआ के वालपुर गाँव में लगने वाले सप्ताहिक हाट में आदिवासी युवक-युवतियाँ जीवन का एक नया रंग तलाशते नज़र आते हैं.
मैंने जब मेले में आई युवकों से उनके आने का प्रायोजन पूछा तो कुछ तो हँसने लगे और कुछ ने कहा कि मस्ती करने आए हैं.
कुछ ने कहा कि वे यहाँ वधू की तलाश में आए हैं.
खरपई ग्राम के अंतर सिंह जामरा ने तो कहा कि यहाँ आए हैं लड़की पसंद कर भगा ले जाएंगे.
अंतर सिंह जामरा का विश्वास शायद इसलिए भी ज़्यादा था क्योंकि उनकी नज़र शायद किसी को ढूंढ चुकी थी.
पता नहीं
जब थोड़ी देर बाद मेले में लगे चरखी के पास उनसे हमारी मुलाक़ात हुई तो वे मुस्कुराने लगे.
उनकी प्रियसी सुमित्रा भी उनके साथ थी. वो कहने लगे,'' इस झूले पर चढूंगा और इसका सब निर्णय कर दूंगा.''
सुमित्रा शर्मा अपना नाम तो बताती हैं लेकिन उससे ज़्यादा कुछ नहीं कहतीं.
आदिवासियों से ज़िद करना खतरनाक है, उनकी फलिया की धार बड़ी तेज़ होती है और इस समय नशे में धुत आदिवासियों का क्या ठिकाना कब भड़क जाएं.
भगोरिया के बारे में कहा जाता है कि शायद प्रारंभ में सामाजिक अस्वीकृति या फिर कन्या के पिता को वर द्वारा दहेज देने की रस्म के कारण यह प्रथा शुरू हुई होगी.
लेकिन प्रेमी युगलों के भागने की शुरू हुई यह प्रथा अब इतनी मान्य हो गई है कि इन मेलों को भगोरिया मेलों के नाम से ही जाना जाने लगा है.
कुछ लोग इसे हिरणकश्यप द्वारा प्रहलाद को मारने, नरसिंह द्वारा उन्हें बचाने और उन्हें भगाने की धार्मिक आस्था से भी जोड़ते हैं.
भील प्रहलाद को अपना पितृ पुरुष भी मानते हैं.
इस संदर्भ में लिखी गई किताबों में भगोरिया की शुरूआत राजा भोज के समय के भील राजाओं कासूमार और बालून द्वारा अपनी राजधानी भागोर में आयोजित विशाल मेले को माना गया है.
जहाँ शायद बड़े पैमाने पर स्वयंवर की प्रथा प्रचलित रही होगी.
शिक्षा और गैर आदिवासी समाज में चल रही रस्मों को जानने के कारण परथाला गाँव के लीला जैसी युवतियाँ भगोरिया के रस्म को नापसंद करती है.
उनका कहना है कि इतनी सामूहिक तौर पर प्रेम की अभिव्यक्ति से महिलाओं की बेइज़्जती होती है.
प्रणय सूत्र
हालाँकि ऐसा नहीं कि भीलों में सारे प्रणय सूत्र भगोरिया मेले में ही जुड़ते हैं.
मेले में मछली की दुकान लगाए थोड़े सरूर में दिख रहे मोहन ने कहा कि उनके परिवार के लोगों ने जरूर उनका रिश्ता ठीक किया था. और लड़की वाले भी यह देखने आए थे कि लड़का कैसा है.
हिल जाति में युवक-युवतियों द्वारा एक दूसरे को पसंद करने के बाद वर पक्ष कन्या के यहाँ तीर और चोली भेजने की भी परंपरा है.
चोली रख तीर वापस कर देने का अर्थ है- स्वीकृति.
चोली वापस करने की सूरत में परिवारों के बीच खूनी संघर्ष की घटनाओं की बातें भी सुनने में आती हैं.
लेकिन खरतला ग्राम की उषा और उनके प्रेमी को इनसे कोई फर्क़ नहीं पड़ता.
वे अपने आप में मस्त हैं.
उन्होंने प्रेम के इज़हार के लिए दोपहर बाद होने वाले सामूहिक नृत्य का समय चुना है.
और नाच गाने के मधुर ताल के इस मादक माहौल के बीच अपने दो दोस्तों की मदद से वो इस युवती को रिझाने में मगन हैं.
उन्होंने हाथों में रखे गुलाल को उसके गालों पर मल दिया और उसकी कलाइयाँ भी पकड़ ली.
इस आदिवासी बाला की रज़ामंदी उसकी खिलखिलाहट से साफ़ है. और मेले का आनंद लेकर तीनों साथ साथ चल दिए.