बुधवार, 30 मार्च, 2005 को 13:35 GMT तक के समाचार
प्रभाकर मणि तिवारी
मधुसूदनपुर से
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से सटा दक्षिण 24-परगना ज़िले का मधुसूदनपुर गाँव देखने में किसी भी आम गाँव जैसा है लेकिन इसकी कड़वी हकीकत का पता चलने पर इसके नाम से जुड़े ‘मधु’ की मिठास मानो गायब हो जाती है.
इस गांव को कोलकाता समेत राज्य के दूसरे स्थानों पर स्थित वेश्यालयों में लड़कियों की सप्लाई के लिए सबसे बदनाम माना जाता है.
सबसे दिलचस्प बात है कि इसे कोई बदनामी नहीं मानता, मधुसूदनपुर के लोगों के लिए यह सब जीवनशैली का हिस्सा है और उन्हें इस पर कोई शर्मिंदगी नहीं है.
गांव के हर दूसरे घर की कम से कम एक युवती देह-व्यापार के धंधे में शामिल है. पूरे गांव की अर्थव्यवस्था ही इस धंधे पर टिकी है. गांव की लड़कियों को उनके मां-बाप ही दलालों के हाथों मोटी रकम लेकर शादी के नाम पर बेच देते हैं.
गांव के एक बुजुर्ग कहते हैं कि "माता-पिता के लिए गरीबी से निजात पाने का यह सबसे आसान तरीका है. वे बेटी के बदले घर की बाकी तमाम खुशियां हासिल कर लेते हैं."
गांव के मर्द भी इस कारोबार से खुश हैं. उनको बिना कुछ किए कमीशन के तौर पर मोटी रकम मिल जाती है.
जीवनशैली
रवि मंडल की बुआ सोनागाछी में काम करती है. उसके कमाए पैसों से मंडल परिवार का मकान तो पक्का हो ही गया है, घर में फिल्में देखने के लिए वीसीडी प्लेयर भी आ गया है.
देह-व्यापार के जरिए पैसा कमाने वाली एक युवती शीतला मंडल ने तो मधुसूदनपुर शीतला प्राइमरी स्कूल के लिए जमीन भी दान में दी है.
इंस्टीट्यूट आफ सोशल साइंसेज की ओर से महिलाओं की खरीद-फरोख्त पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के लिए तैयार ताजा रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल तीसरे स्थान पर है.
देश के सबसे घनी आबादी वाले दस जिलों में से पांच इसी राज्य में हैं, इनमें से भी बांग्लादेश की सीमा से लगे उत्तर 24-परगना, दक्षिण 24-परगना और मुर्शिदाबाद में महिलाओं की खरीद-फरोख्त सबसे ज्यादा होती है.
मधुसूदनपुर की सभी युवतियों की कहानी लगभग एक जैसी है. काफी कम उम्र में ही उनकी ‘शादी’ कर दी जाती है. उसके बाद उसका कोई सुराग नहीं मिलता.
दरअसल, ऐसी शादियां घरवालों की सहमति से धन के बदले होती हैं. शादी करने वाले ज्यादातर दलाल होते हैं जो अपनी नवविवाहिता को किसी कोठे पर बेच देते हैं.
कई युवतियां अचानक गांव से गायब हो जाती हैं लेकिन घरवाले पुलिस में कभी इस बात की रिपोर्ट नहीं लिखाते.
गाँव के जो लोग चाहते हैं कि उनके घर की लड़कियाँ इस धंधे में न पड़ जाएँ वे अपनी किशोरियों को दूर किसी रिश्तेदार के यहाँ रहने के लिए भेज देते हैं.
अब गांव में सक्रिय एक गैर-सरकारी संगठन ‘सुचेतना’ गांव की लड़कियों को इस पेशे से दूर रखने का प्रयास कर रहा है.
वह युवतियों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक स्कूल भी चला रहा है. वहां उनको कढ़ाई आदि का प्रशिक्षण दिया जाता है लेकिन जब गांव में सबकी सहमति से यह काम होता हो, तो इस पर अंकुश लगाना बहुत ही मुश्किल है.