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बुधवार, 30 मार्च, 2005 को 03:18 GMT तक के समाचार

जगदीश्वर चतुर्वेदी
वामपंथी चिंतक, कोलकाता

कम्युनिस्ट आंदोलन की एकता का संकट

भारत में यह राजनीतिक ध्रुवीकरण का युग है. इस प्रक्रिया में कम्युनिस्ट पार्टियाँ अपने लिए नए रास्ते तलाश रही हैं.

परंपरागत जनाधार को बचाए रखकर नए जनाधार की तलाश कर रही हैं.

आज़ादी के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि केंद्र सरकार उनके समर्थन पर टिकी है.

वामपंथी चाहते हैं कि यूपीए की केंद्र सरकार टिकी रहे. साथ ही वे विपक्ष की भूमिका भी निभाते रहें.

इस समूची प्रक्रिया में प्रतिरोध का परिवेश बचाए रखना सबसे बड़ी समस्या है. उदारीकरण के कारण बड़े पैमाने पर उद्योग बंद हो रहे हैं.

मजदूरवर्ग गायब होता जा रहा है. मजदूर आंदोलन के किले ख़त्म हो रहे हैं.

ऐसी परिस्थितियों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के चंडीगढ़ महाधिवेशन में जो राजनीतिक प्रस्ताव बहस के लिए पेश किया जाना है उसमें कम्युनिस्ट पार्टियों के एकीकरण के सवाल को अहमियत दी गई है.

इसके विपरीत भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के दिल्ली में होने वाले 18वें महाधिवेशन के राजनीतिक प्रस्ताव में कम्युनिस्ट एकता की बजाए वामपंथी मोर्चे को मजबूत बनाने का कार्यक्रम पेश किया जाना है.

माकपा का मानना है कि मौजूदा हालात में कम्युनिस्ट पार्टियों का एकीकरण संभव नहीं है. एकीकरण में पहली बड़ी बाधा है कि इन दोनों के राजनीतिक कार्यक्रम जिनमें बुनियादी मतभेद हैं.

ये मतभेद कैसे हल हों इसका कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा. दूसरी बड़ी समस्या है एकीकरण के बाद जन संगठनों के नेतृत्व की.

तीसरी बड़ी समस्या है कम्युनिस्ट पार्टियों के पास जो संपत्ति है उसके स्वामित्व की.

वास्तविकता यह है कि हिंदी भाषी राज्यों में कम्युनिस्ट आंदोलन क्रमशः कमजोर हुआ है. कम्युनिस्ट पार्टियों का जनाधार घटा है.

बाधा

कम्युनिस्ट आंदोलन के लिए आज भी सबसे बड़ी बाधा है कम्युनिस्ट शक्ति का केरल, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में ही सीमित होकर रह जाना.

इन राज्यों के कम्युनिस्ट आंदोलन के हितों को ध्यान में रखकर ही मौजूदा केंद्र सरकार में वामपंथी दल शामिल नहीं हुए.

वामपंथी दल यदि केंद्र सरकार में शामिल होते तो पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा के राजनीतिक परिदृश्य में अकल्पनीय परिवर्तन आ सकते थे.

नए राजनीतिक प्रयोग से यह भी संभव था कि वामपंथी दलों की ताकत घट जाती और यह भी संभव था कि वामपंथ क्षेत्रीय दायरे को तोड़कर आगे चला जाता.

उल्लेखनीय है कि 1977 तक कम्युनिस्ट पार्टियाँ संसद में कांग्रेस का प्रमुख विपक्ष थीं. किंतु बाद में यह जगह उनके हाथ से चली गई.

महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, उत्तरांचल, पंजाब, बिहार और आंध्र में कम्युनिस्ट पार्टियों की शक्ति घटती चली गई.

जनता के असंतोष और राजनीतिक आकांक्षा व्यक्त करने वाली नई राजनीतिक ताकतों के उभार ने वामपंथी आंदोलन के विकास को और भी कठिन बना दिया.

वर्चस्व

कम्युनिस्ट पार्टियों के आंतरिक सांगठनिक ढ़ाँचे में केरल, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा का वर्चस्व है.

कायदे से इसमें समूचे देश को ध्यान में रखकर संतुलन पैदा किया जाना चाहिए. कम्युनिस्ट आंदोलन के एकीकरण की समस्त संभावनाएँ इस बात पर निर्भर करती हैं कि हिंदीभाषी राज्यों में भविष्य में कम्युनिस्ट आंदोलन किस तरह विकास करता है.

भाकपा का मानना है कि कम्युनिस्ट एकता ‘सिद्धांतों’ पर आधारित होनी चाहिए किंतु यह नहीं बताया गया कि एकता किन सिद्धांतों पर होगी.

मजेदार बात यह है कि भाकपा विगत छह सालों से कम्युनिस्ट एकता का राग अलाप रही है किंतु एकता के आधारों का खुलासा नहीं कर पायी है.

इससे यह भी पता चलता है कि भाकपा कम्युनिस्ट एकता की वायवीय कल्पना में रहती है. भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के विकास में सबसे बड़ी बाधा है समाज का जातिवादी गणित.

1980 के बाद निचली और मध्यवर्ती जातियों का नए सिरे से राजनीतिक ध्रुवीकरण हुआ है. इस क्रम में कम्युनिस्टों का जनाधार खिसका है.

खासकर बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश में इसका व्यापक असर देखने में मिला है. इसके अलावा मजदूरों के बीच में भी अनुसूचित जातियों और जनजातियों के नए संगठनों के उभार ने मजदूर आंदोलन में दरार पैदा की है.

जातियों के इस नए उभार के प्रति दीर्घकालिक और अल्पकालिक किस तरह की रणनीति अपनाई जाए यह भी अभी तक साफ़ नहीं है.

कम्युनिस्ट पार्टियाँ सांप्रदायिकता, भूमंडलीकरण और राजनीति के अपराधीकरण को लेकर बेहद जटिल मुश्किलों से जूझ रही हैं.

इन तीनों मसलों पर गैर वामदलों के साथ साझा राजनीतिक जमीनी कार्यक्रम तैयार नहीं हो पाया है.

इनके ख़िलाफ़ संघर्ष में यदि कोई मोर्चा बनता है तो उसकी क्या शक्ल होगी? कौन सी पार्टियाँ उसमें शामिल होंगी? क्या इस मोर्चे को खुले रूप में रखा जाए? क्या इसमें कांग्रेस को भी शामिल किया जाए?

ये कुछ मसले हैं जिन पर कम्युनिस्ट पार्टियाँ आम सहमति का रास्ता तलाश रही हैं.

कम्युनिस्ट पार्टियों में भूमंडलीकरण का प्रभाव भी देखा जा सकता है. वे उन रास्तों की भी तलाश कर रहे हैं जिनके जरिए भूमंडलीकरण के लाभ उठाते हुए पश्चिम बंगाल में औद्योगिक जान फूँकी जा सके.

केरल के कृषि विनाश को रोका जा सके. भूमंडलीकरण के दौर में जनतंत्र के प्रति सारी दुनिया में आकर्षण पैदा हुआ है.

इसके कारण विश्व के तमाम कम्युनिस्ट संगठनों ने भारत के कम्युनिस्टों के अनुभवों से लाभ उठाना शुरू कर दिया है.