बुधवार, 30 मार्च, 2005 को 04:35 GMT तक के समाचार
सुधीश पचौरी
राजनीतिक एवं सामाजिक टीकाकार
वामपंथी दल इन दिनों उत्साहित नज़र आते हैं. कारण है लोकसभा में उनकी संख्या 61 है.
यूपीए सरकार उनके समर्थन से बनी है और चल रही है. उन्होंने कोई मंत्रालय नहीं लिया.
सत्ता-लालची दुनिया में वामदलों ने सत्ता की माया से मुक्त रहकर सत्ता को साधा. इससे जनता में उनकी साख बढ़ी है.
संसद में और उसके बाहर यूपीए के साथ वामदलों ने ‘कभी नरम कभी गरम’ की नीति अपनाई है.
चाहे विनिवेशीकरण का मामला हो या पेंशन का या फिर पेटेंट का या दिल्ली के छोटे मझोले उद्योगों के बंद करने का, सब पर वामदलों ने उनमें भी खासकर मार्क्सवादी पार्टी ने संघर्ष और आलोचना जारी रखा है.
इसके परिणाम अच्छे रहे हैं. दिल्ली के उद्योग उजड़ने से बच गए. पेटेंट में कुछ राहत हुई.
इस तरह सरकार पर दबाव बनाकर जनता के लिए राहत पाने की नीति किसी हद तक कामयाब नजर आती है.
इससे वामपंथी दल अपनी नई भूमिका में उत्साहित हैं. यह सरकार उनके बल पर चल रही है.
वे भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिए इस सरकार का समर्थन करते रहने वाले हैं, यह एक कठिन स्थिति भी है.
सरकार चलती रहे और वे भी अपनी मौजूदगी और दबाव दर्ज करा सकें और अपने चुनाव क्षेत्र के लिए राहत पा सकें.
सीमाएँ
दबाव की राजनीति के इस अनुभव ने उन्हें अपनी शक्ति और सीमाओं को बता दिया है.
वे दो तीन इलाक़ों में ताकतवर हैं. 225 सीटों को देने वाले, सत्ता का स्वरूप तय करने वाले हिंदी क्षेत्रों में उनकी मौजूदगी न के बराबर है.
अगर उनकी संसदीय ताकत कुछ क्षेत्रों के बल पर सिर्फ़ इतनी ही बनी रही तो बहुत दिनों तक दबाव की राजनीति भी टिक नहीं सकेगी.
इसलिए उन्हें तेज़ी से फ़ैलना चाहिए. हालांकि अपनी सीमा को जानकर एक गहरी बेचैनी उनमें बढ़ी है.
मार्क्सवादी पार्टी ने इसे महसूस किया है. सीपीआई ने भी इसे महसूस किया है. अन्य वामपंथी गुटों ने भी बार-बार हिंदी क्षेत्रों की ओर देखा है.
आने-वाले चार-पाँच सालों में वामपंथी दल हिंदी क्षेत्रों में तेज़ी से काम करने के इरादे से अपनी नीतियाँ तय करने में लगे हैं, सीपीआई ने इसके लिए एक व्यापक सांस्कृतिक अभियान सोचा है.
उधर मार्क्सवादी पार्टी को अचानक 26 साल बाद सल्किया प्लेनम की रिपोर्ट याद आई है जो अरसे से ठंडे बस्ते में पड़ी थी.
इससे लगता है कि एक बड़ी वामपंथी पार्टी के रूप में मार्क्सवादी पार्टी अपनी सीमाएं तोड़ने का प्रयत्न कर रही है.
सल्किया प्लेनम में मार्क्सवादी पार्टी ने कहा था कि हिंदी क्षेत्रों में जनआंदोलन और संगठन का तेज़ी से विकास करना ज़रूरी है. साथ ही बहुत से स्वतः स्फूर्त आंदोलनों को भी देखना है और उनसे अपना रिश्ता तय करना है.
नए तौर तरीक़े
इस तरह पुराने ढंग के तौर-तरीक़ों की जगह पार्टी कुछ नए तौर-तरीकों के बारे में सोचने लगी है.
इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि पार्टी अपनी 18 वीं काँग्रेस पहली बार किसी हिंदी क्षेत्र में यानी दिल्ली में करने जा रही है.
इसी सिलसिले में पार्टी ने हिंदी क्षेत्रों को समझने के लिए ‘कामरेड मेजर जयपाल सिंह संगोष्ठी’ मंच बनाया.
हमदर्द बुद्धिजीवियों द्वारा ‘हिंदी क्षेत्रः तकलीफें और मुक्ति के रास्ते’ नाम से लगातार सात दिनों तक मैराथन सेमिनार किया गया.
भूमंडलीकरण के दौर में आर्थिक नीतियों ने हिंदी क्षेत्र को किस तरह से प्रभावित किया है यहाँ सामाजिक बिखराव और विविधता, एकता के प्रश्न किस तरह के हैं.
अल्पसंख्यकों, दलित, हाशियाकृत समूहों, विस्थापितों और स्त्रियों के सवाल किस तरह से उठते हैं.
मीडिया किस तरह से हिंदी समाज को बनाता है, रिपोर्ट करता है? उसकी ताक़त और ज़िम्मेदारी क्या है? शिक्षा की स्थिति क्या है? धार्मिक संस्थान कितने पारदर्शी हैं, कर्मकांड अंधविश्वास, जातिवाद और सांप्रदायिकता उसके पिछड़ेपन के लिए कितने ज़िम्मेदार है? भाषा के प्रश्न क्या है? हिंदी, उर्दू और तमाम बोलियों के सवाल क्या है?
इन ढेर सारे सवालों पर, हिंदी क्षेत्रों के आए कुल 125 हिंदी विद्वानों ने तीन चार श्रोताओं के बीच दिन भर खुला विचार-विमर्श किया. इस मैराथन गोष्ठी का उदघाटन करते हुए मार्क्सवादी पार्टी के महासचिव सुरजीत ने स्वीकारा कि बहुत दिन बाद हम हिंदी की ओर आ रहे हैं यहाँ जो होगा उसे हम देखेंगे विचार करेंगे.
सीताराम येचुरी ने कहा कि हम हिंदी में बढ़े बिना आगे नहीं बढ़ सकते.
काँग्रेस की स्वागत समिति के अध्यक्ष जोगेन्द्र शर्मा ने कहा कि हम सिर्फ़ मंच देंगे, सिर्फ़ सुनना चाहेंगे, सात दिन तक तरह-तरह के विचार आए. कई बार मार्क्सवादी पार्टी की आलोचना भी हुई.
लेकिन चार-पाँच सौ हिस्सेदारों को तब अचरज हुई हुआ जब उन्होंने पाया कि पार्टी ने सिर्फ़ सुना और आक्षेपों को भी सहा, इस सहनशीलता और खुलेपन का प्रभाव हुआ.
खुलापन
पहली बार किसी कम्युनिस्ट पार्टी ने विचार में खुलेपन का परिचय दिया.
अंत में प्रकाश करात ने घोषणा की कि यह सिलसिला आगे चलेगा क्योंकि हिंदी क्षेत्रों में आगे बढ़ना है.
वहाँ बहुत संभावना है क्योंकि यह समस्याओं से घिरा समाज है. लोग कम्युनिस्टों की ओर आशा से देख रहे हैं.
पार्टी काँग्रेस में इन मुद्दों पर भी विचार होगा. देखना होगा कि वामपंथी दल अपने ऐसे संकल्पों पर कितने खरे उतरते हैं.
हिंदी क्षेत्र में बढ़ेंगे तो आगे चलेंगे वरना कब तक बंगाल और केरल की कमाई पर जिएंगे? लेकिन यह भी याद रखा जाना चाहिए कि हिंदी क्षेत्र एक प्रकार की माइनफील्ड है.
कही जाति कही धर्म कहीं अंधविश्वास. पता नहीं कब से जमा है, जनता बेहाल है और उसमें भयानक छटपटाहट है. वे सब ओर से निराश हैं.
वामदलों के लिए यह अवसर भी है और चुनौती भी.
यह वक़्त ही बताएगा कि वामदल अपने संकल्प पर कितने खरे उतरते हैं.