मंगलवार, 22 मार्च, 2005 को 17:45 GMT तक के समाचार
शिवकांत, बीबीसी रेडियो संपादक
धनबाद से
धनबाद में जब बीबीसी हिंदी का कारवाँ पहुँचा तो लोगों से काले सोने यानी कोयले से जुड़े सवालों और मुद्दों पर बातचीत हुई.
लोग इसपर अपनी अपनी राय दें और बातचीत में हर वर्ग को अपनी बात रखने का मौका मिले, इसके लिए हमने अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों से इस चर्चा में बातचीत की.
हमारे साथ इस मौके पर खान अनुसंधान संस्थान के पूर्व निदेशक टीएन भाटिया, लायंस क्लब, धनबाद की अध्यक्ष अरुणा बिगनिया और झरिया बचाओ समिति के सचिव अशोक अग्रवाल भी मौजूद थे.
कार्यक्रम की शुरुआत हमने टीएन भाटिया से की. उनसे हमने जानना चाहा कि कोयले के अटूट भंडार वाले क्षेत्र झरिया और धनबाद, जिनमें कोयला खदानों की कुछ पट्टियों में आग लगी हुई है, उनको अगर वहाँ से हटाकर कहीं और बसा दें तो क्या इन क्षेत्रों का ज़्यादा विकास संभव है.
जवाब देते हुए भाटिया कहते हैं, “झरिया शहर को न बचाने का कोई कारण नहीं है. इसके लिए वैज्ञानिक तकनीकी उपलब्ध है. ख़ुद बीसीसीएल ने पाँच तरह की आगों को नियंत्रित करने की सरल तकनीकी विकसित की है और इससे वो 90 मिलियन टन कोयला बचाने में सफ़ल रहे हैं.”
वो बताते हैं, “ऐसे में जब झरिया में ख़ुद ही इस आग से नियंत्रण की तकनीकी विकसित हो चुकी है तो इन शहरों को कहीं और बसाने का सवाल उठाना, बगलें झाँकने जैसा है, न कि हल निकालने की कोशिश.”
इसपर दूसरी प्रतिक्रिया के लिए हम अशोक अग्रवाल की ओर मुख़ातिब हुए. पूछा कि क्या ऐसा संभव है कि झरिया भी वहीं बसा रहे और आग पर काबू भी पाया जा सके.
और इसके जवाब में एक रोचक तथ्य सामने आया, “बीसीसीएल को तो कोयला चाहिए और इसके लिए खुला उत्खनन सबसे बेहतर तरीका हो सकता है. इनकी जो खदानें हैं वो झरिया के आसपास हैं इसीलिए इनकी नज़र इस बात पर हैं कि झरिया शहर अगर खाली है जाए तो ये इसको खुली खदान में तब्दील कर देंगे.”
वो चिंता व्यक्त करते हुए कहते हैं, “ वो नही समझ रहे कि यह कितना महँगा काम है, केवल पैसों के ही अर्थों में ही नहीं, बल्कि मानवीय अर्थों में भी. किसी भी इंजीनियर से पूछ कर देखें तो पता चलेगा कि आग बुझाई जा सकती है. इसके लिए झरिया में प्रचुर मात्रा में पानी भी है और बालू भरकर भी आग बुझाने जैसे विकल्प मौजूद हैं.”
पर ऐसा नहीं है कि इस दिशा में प्रयास नहीं हुए. अशोक बताते हैं कि अबतक इस सवाल पर कई कमेटियों का गठन किया जा चुका है. ख़ुद प्रधानमंत्री की ओर से बनी एक उच्चस्तरीय कमेटी ने अपनी सिफ़ारिशों में कहा था कि पूरे झरिया शहर को बालू से भर दिया जाए पर इसपर कोई अमल नहीं किया गया.
ग्रीन हाउस इफ़ैक्ट और ग्लोबल वार्मिंग को किसी भी तरह से कम करना और इसके लिए यहाँ पर गैसो के उत्सर्जन को कम करना यहाँ एक बड़ी चुनौती है और अगले 10 वर्षों में अगर इसका विकल्प निकलता है तो उस स्थिति में झरिया क्या करेगा, इस सवाल पर भी मैंने लोगों की राय जाननी चाही.
बीबीसी संवाददाता, रेनू अगाल इसे और साफ़ करते हुए सवाल करती हैं कि अगर कोयला ही न रहा तो क्या धनबाद आबाद रह पाएगा.
इस सवाल के जवाब में प्रभात ख़बर समाचार पत्र के पत्रकार, उत्तम मुखर्जी बताते हैं, “धनबाद के टुंडी और तोपचाची इलाकों, जो कि उग्रवाद प्रभावित हैं, में ज़मीन पर फूलों की खेती और गेंहू-चावल जैसी अन्य फसलों की खेती की जा सकती है.”
अपने दूसरे तर्क में वो बताते हैं, “क्षेत्र में मीथेन गैस पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है जो कि दूसरा बड़ा विकल्प है. ऐसे में हम पर्यटन, पर्यावरण और खेती जैसे विकल्पों की मदद से भी आगे बढ़ सकते हैं.”
उधर टीएन भाटिया 'वैल्यू एडिशन टू दि मिनरल' का तर्क देते हुए बताते हैं कि जर्मनी में दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान कोयले से 67 अवयव तैयार किए गए थे. वैसा ही यहाँ भी हो सकता था. इससे लोगों के लिए रोज़गार के अवसरों में बढ़ोत्तरी होती और इन क्षेत्रों का विकास भी होता.
वो बताते हैं कि धनबाद को केवल कोयला निकालने के क्षेत्र के रूप में देखा गया और सारी भूमिका केवल सेल्समैनशिप वाली ही रही.
इसके साथ ही चर्चा अपने अंतिम बिंदु तक पहुँची. नतीजा निकला कि झरिया को उजाड़ने की कोई आवश्यकता नहीं है और अब तक कोयले के उत्खनन व दोहन का जो तरीका अपनाया गया, वो सही नहीं था.
पर इससे भी अहम था अंतिम बिंदु जिसके मुताबिक धनबाद को यदि सही मायनों में विकसित होना है तो सर्वांगीण विकास के बारे में सोचना होगा. कोयले के अलावा अन्य विकल्पों पर भी सोचना होगा.