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मंगलवार, 22 मार्च, 2005 को 12:25 GMT तक के समाचार

भूटान से लौटकर गीता पांडे
बीबीसी संवाददाता

भूटान में टीवी बना चिंता का सबब

भूटान में टीवी चिंता का सबब बनता जा रहा है. वहाँ बच्चे हों या युवा सभी घंटों टीवी देख रहे हैं. इसको लेकर वहाँ चिंता व्यक्त की जा रही है.

भूटान में टीवी पाँच साल पहले शुरू किया गया था और सरकारी भूटान ब्रॉडकास्टिंग सर्विस पर दिन में सिर्फ़ चार घंटे के प्रोग्राम दिखाए जाते हैं. मगर भूटान में केबल के ज़रिए 40 से ज़्यादा चैनल देखे जा सकते हैं.

यहाँ के लोगों में भारत में बने धारावाहिक जैसे कि सास भी कभी बहू थी, कसौटी ज़िंदगी की और कहानी घर-घर की बहुत लोकप्रिय हैं.

चोकी वांगमो अपने तीन बच्चों के साथ टीवी देखती हैं.

चोकी वांगमो कहती हैं,''उनके बच्चे दिन में कई घंटे टीवी देखते हैं,कभी अंग्रेज़ी में तो कभी हिंदी के सीरियल और कभी तरह-तरह के कार्टून.''

उनका कहना है,''छुट्टियों में तो ये बच्चे सारा दिन टीवी के सामने बैठे रहते हैं. अब ये खेलने के लिए बाहर भी बहुत कम जाते हैं. और हमारे घर में बातें भी आजकल टीवी के कार्यक्रमों के बारे में होती है.''

बहस

मगर कुछ लोग मानते हैं कि लोगों का टीवी से यह लगाव सही नहीं है.

किनले दोरजी भूटान के एकमात्र अखबार कुन्सेल के मुख्य संपादक हैं और वे टीवी की तुलना एक हवाई हमले से करते हैं.

उनका कहना है,'' यहाँ बच्चों को सबसे ज़्यादा मज़ा वर्ल्ड रेसलिंग फेडरेशन की कुश्ती देखने में आता है. बड़े-बड़े लोगों की उठा-पटक उन्होंने पहले कभी नहीं देखी थी. मगर जल्द ही बच्चों ने खुद भी ये उठा-पटक शुरू कर दी. फिर ख़बर आई कि मध्य भूटान के एक स्कूली बच्चे का हाथ टूट गया क्योंकि उसके दोस्त ने उसे उठा कर पटक दिया था.''

दोरजी ओम थिम्पू में एक ग़ैर-सरकारी संगठन युवा विकास कोष के लिए काम करती हैं. इनके विचार किनले दोरजी के विचारों से बिलकुल अलग है.

उनका मानना है,''मैं यह नहीं मानती कि भूटान में जो भी गलत हो रहा है वह टीवी की वजह से है. टीवी पर दिखाए जाने वाले ज़्यादातर कार्यक्रम सुरक्षित हैं.''

बहस

अब टीवी का असर अच्छा है या बुरा. इस पर भले ही बहस चल रही हो, मगर इस बात पर सर्वसम्मति है कि भूटान के लोग टीवी कुछ ज़्यादा ही देख रहे हैं.

यहाँ के संचार और सूचना मंत्री लेकी दोरजी बताते हैं कि सरकार टीवी पर दिखाए जाने वाले कार्यक्रमों की गुणवत्ता की जाँच के लिए एक क़ानून बना रही है.

मगर वो कहते हैं कि इस विषय में सरकार की भूमिका सीमित है.

उनका कहना है,''विदेशों से दिखाए जाने वाले कार्यक्रम पर रोक लगाना असंभव है क्योंकि अब कंप्यूटर और इंटरनेट का ज़माना है. बच्चे क्या देखें, कब देखें और क्या न देंखे, इस पर नज़र रखना उनके माँ-बाप का काम है.''

जब टीवी भूटान में शुरू हुआ तो इसे कोई ख़ास चुनौती का सामना नहीं करना पड़ा क्योंकि यहाँ फ़िल्म उद्योग का अस्तित्व लगभग नहीं है.और केबल टीवी आसानी से घर-घर तक पहुँच जाता है.

पर अब टीवी का प्रभाव समाज पर अच्छा है या बुरा-इस बारे में चर्चा तेज़ हो गई है.

प्रेक्षक मानते हैं कि इसके जल्द खत्म होने के आसार नज़र नहीं आ रहे.