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सोमवार, 21 मार्च, 2005 को 18:17 GMT तक के समाचार

शिवकांत, बीबीसी रेडियो संपादक
झरिया से

आग पर बसे झरिया को उजाड़ने की बात

झरिया शहर कोयले के एक विशाल भंडार पर बसा हुआ है समस्या यह है कि कोयले की आग के सुलगते ढेर पर बसे झरिया को उजाड़ कर नई जगह पर बसाने की बात कही जा रही है.

दिलचस्प बात यह है कि हज़ारों लोग इसी सुलगती हुई ज़मीन पर झोपड़े डालकर बसते हैं और ज़हरीले धुएँ में साँस लेते हैं.

रामगोविंद साहू ऐसी ही झोपड़पट्टी में रहते हैं. वो बताते हैं, “क्या करें, और कोई रास्ता ही नहीं है. यह ज़मीन हमारी ख़रीदी हुई है. बाप-दादाओं के समय से हम यहीं बसे हैं.”

पर जब उनसे कहा कि अपनी ज़मीन से भी ज़हर या आग निकलने लगे तो आदमी छोड़कर जाता तो है न. इसपर वो बोले, “भागकर जाएँ भी तो कहाँ, कहाँ बसर होगा. मरना तो यहाँ भी है और नई जगह पर भी. नई जगह पर तो भूखे मर जाएँगे. उससे तो बेहतर यहीं मर जाना है.”

ज़मीन के भीतर से सुलगते हुए कोयले से निकलने वाली गैसें अब झरिया शहर के भीतर भी तमाम जगहों से निकलने लगीं हैं लेकिन लोग एक तरह से उनके ख़तरे से बेख़बर जिए जाते हैं.

आख़िर क्या मजबूरियाँ हैं इन लोगों की, यह पूछने पर झरिया बचाओ समिति के सचिव अशोक अग्रवाल बताते है, यह लोगों की मजबूरी है क्योंकि कोयला ही इन लोगों की जीविका का साधन है. ये खदान से कोयला चारी करते हैं.

वहाँ रहकर चोरी करना कैसे संभव हो पाता है, पूछने पर वो बताते हैं, “आपको जानकर ताज्जुब होगा कि पूरे झरिया शहर में एक भी कोयला डिपो नहीं है फिर भी लोग कोयला जला रहे हैं, यह कहाँ से आता है.ज़ाहिर है कि यह कोयला चोरी का ही है.”

शहर उजाड़ने की योजना

भारत सरकार की कोयला कंपनियाँ चाहती हैं कि झरिया शहर को उजाड़कर कहीं और बसा दिया जाए और शेष कोयला भंडार में आग लगने से पहले उसे निकाला और इस्तेमाल में लाया जा सके.

पर क्या लोग इस विस्थापन के लिए तैयार हैं. इस बाबत झरिया की आग प्रभावित क्षेत्र के पास की एक बस्ती के लल्लन कहते हैं, “घर-दुआर मिल जाने के बाद तो हम इस जगह को छोड़ ही देंगे. जैसे और लोग कमा रहे हैं, हम भी कमा-खा लेंगे.”

उधर उनकी पत्नी कहती हैं, “हमको इस गैस में रहकर कोई सुख नहीं मिल रहा पर क्या करें, कहीं और कैसे जाए.”

पर झरिया बचाओ समिति के अशोक कहते हैं, “इनको पहले आग बुझानी चाहिए. ऐसा नहीं है कि यह आग बुझाई नहीं जा सकती है. आग केवल ऊपरी सतह पर है न कि भीतर तक."

उन्होंने कहा, "इसको बुझाने के कई तरीके हैं. सबसे आसान तरीका सेंड स्टोनिंग है. जहाँ जहाँ से कोयला निकाला, वहाँ बालू भरना चाहिए. इसका मतलब है कि बालू नहीं भरी जा रही है यानी बालू में कुछ हेराफेरी हुई है.”

महत्वपूर्ण यह है कि झरिया के लोग क्या चाहते हैं, क्या वो झरिया से कहीं दूर जाना चाहते हैं या फिर झरिया में ही रहना चाहते हैं.

और लोगों से मुख़ातिब हुए तो उन्होंने एक स्वर में कहा कि वो झरिया छोड़कर नहीं जाना चाहते. कइयों ने तो यह भी कहा कि सरकार को आग बुझाने का उपाय करना चाहिए.

कुछ का आरोप था कि आग पर काबू के लिए जो पैसा भेजा गया, वो भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया. ख़ुद झरिया बचाओ समिति का मानना है कि बड़ी कोयला कंपनियाँ सरकार से झरिया को बचाने के नाम पर अच्छा मुनाफ़ा कमाना चाहती हैं. उनकी नज़र झरिया के नीचे दबे कोयला भंडार पर है.

वो बताते हैं, “बीसीसीएल की मंशा साफ़ है. उनका कोयला चाहिए जबकि इस तरह से खुला उत्खनन इस क्षेत्र के लिए घातक है. सच तो यह है कि यहाँ जिस तरह की स्थितियाँ हैं, उनमें खुला उत्खनन होना ही नहीं चाहिए.”

“जो निजी क्षेत्र की कंपनियाँ हैं, उन्होंने कभी यहाँ खुला उत्खनन नहीं किया. बीसीसीएल की मंशा है कि झरिया को खाली करा लिया जाए ताकि वो वहाँ खुला उत्खनन कर सकें.”

सुलगती आग के साथ तेज़ होती इस बहस में शायद वो लोग चुपचाप दम तोड़ रहे हैं जो आजीविका के लिए कोयले की जहरीली गैस में रहने और साँस लेने को मजबूर हैं.