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सोमवार, 07 मार्च, 2005 को 03:55 GMT तक के समाचार

आलोक मेहता
संपादक, आउटलुक हिंदी

लालू लड़ेंगे अब आरपार की लड़ाई

बिहार में राष्ट्रपति शासन के बाद दो सवाल हैं. एक लालू प्रसाद यादव के पास क्या विकल्प हैं और दूसरा कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी क्या करेंगी.

ऐसा लगता है कि लालू प्रसाद यादव को आरपार की लड़ाई लड़नी होगी और दिखता है कि उन्होंने यह लड़ाई शुरु कर दी है.

अब लालू प्रसाद यादव चाहेंगे कि किसी भी तरह रामविलास पासवान को केंद्र में सत्तारुढ़ गठबंधन यूपीए से किसी तरह अलग किया जा सके.

इसीलिए उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी पर दबाव एक तरह से बनाया है कि वे यह तय करलें कि वे (यानी लालू प्रसाद यादव) उनके मित्र हैं या रामविलास पासवान.

लालू प्रसाद यादव के पास सांसदों की संख्या अधिक है इसलिए उनका दबाव तो रहेगा.

दूसरी ओर कांग्रेस में रामविलास पासवान की ढुलमुल नीति से नाराज़गी दिख रही है. पहले उन्होंने कांग्रेस का साथ लिया लेकिन अब लग रहा है कि वे भाजपा का बाहर से समर्थन मिल जाए तो वे सरकार बना सकते हैं.

पहले लगता था कि पासवान मुस्लिम वोटों को समेटना चाहते हैं लेकिन ऐसा दिखता है कि पासवान किसी तरह सत्ता में आना चाहते हैं और उनको लग रहा है कि बिहार में एक बार वे सत्ता में आ गए तो समीकरणों को ठीक कर लेंगे.

वे हमेशा मानते आए हैं कि अल्पसंख्यक वोट तो उनके ही खाते में है.

वे चाहते हैं कि वे ख़ुद मुख्यमंत्री बन जाएँ या फिर केंद्र में बड़े से बड़ा पद उन्हें मिल जाए.

उन्होंने पर्दे के पीछे से एक प्रस्ताव यूपीए के पास भेजा था कि उन्हें उपप्रधानमंत्री बना दिया जाए.

सोनिया गाँधी के सामने चुनौती

तीन राज्यों में जिस तरह की फ़जीहत कांग्रेस की हुई है उसके बाद उनके सामने भी एक बड़ा प्रश्नचिन्ह है कि वे अपनी रणनीति अब कैसे बनाएँगे.

जल्दबाज़ी में और जिन सलाहकारों के भरोसे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी रही हैं उससे उनको बहुत नुक़सान हुआ है.

सोनिया गाँधी की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे राय सबसे लेती हैं लेकिन फ़ैसला ख़ुद नहीं ले पातीं.

शायद इसीलिए उन्होंने आरजेडी के साथ रहते हुए भी उसका विरोध किया, पासवान के साथ रहे लेकिन आधे मन से ही. उनके मन में था कि मुख्यमंत्री कांग्रेस का ही होगा.

उनके सलाहकार मानते हैं कि इंमरजेंसी के पहले जिस तरह से कांग्रेस के हाथों में सत्ता रही आज भी हर राज्य में उनका मुख्यमंत्री हो सकता है.

अगर एक बार कांग्रेस तय कर लें कि तीन-चार साल चाहे सत्ता में रहे या न रहें लेकिन जनता के बीच रहकर उन्हें अगला लोकसभा या किसी विधानसभा का चुनाव जीतना है तो उन्हें सड़क की लड़ाई लड़नी होगी.