गुरुवार, 03 मार्च, 2005 को 13:56 GMT तक के समाचार
पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में सामूहिक बलात्कार के एक मामले में जिन पांच लोगों को मौत की सज़ा सुनाई गई थी उन सभी को बरी कर दिया गया है.
इस मामले के छठे व्यक्ति को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई.
लाहौर में इस मामले की सुनवाई करने वाले न्यायाधीशों का कहना था कि अपराध साबित करने के लिए सबूत पर्याप्त नहीं थे.
यह मामला मुख्तार माई नामक एक महिला के सामूहिक बलात्कार से जुड़ा हुआ है.
यह मामला फरवरी 2002 में सामने आया था. जिसके बारे में कहा जाता है कि पाकिस्तान की एक कबीलाई परिषद ने मुख्तार माई के बलात्कार के आदेश दिए थे.
उसी साल अगस्त महीने में डेरा ग़ाज़ी खान की एक विशेष आतंकवाद निरोधक अदालत में इस मामले की सुनवाई हुई जिसमें 14 लोगों की पेशी हुई लेकिन सिर्फ छह लोगों को दोषी ठहराया गया.
इन सभी ने लाहौर हाई कोर्ट में अपील की. लाहौर हाई कोर्ट की मुल्तान पीठ ने अपने फैसले में पुलिस द्वारा इस मामले की जांच में अपनाई गई प्रक्रिया की भी आलोचना की.
बचाव पक्ष के वकील मोहम्मद सलीम का कहना था कि मामले में पूरा न्याय हुआ है. उन्होंने कहा " अगस्त 2002 में अदालत का फैसला मीडिया में छपी ख़बरों से प्रभावित था. अब न्याय हुआ है. "
यह फ़ैसला सुनते ही मुख्तार माई अदालत में ही रोने लगी.
रायर्टस संवाद समिति के अनुसार उन्होंने कहा " मैं अपील करुंगी. मैं जहां हो सकेगा, इसके ख़िलाफ़ जहां तक होगा जाऊंगी. "
मानवाधिकार मामलों की वकील हिना ज़िलानी ने कहा कि मामले की सुनवाई फिर से होनी चाहिए.
पुराना मामला
पाकिस्तान के दक्षिणी पंजाब इलाके में मुख्तार माई के छोटे भाई शकूर को कबीले वालों ने एक लड़की के बलात्कार का दोषी पाया था जिसके बाद कबीले ने फैसला दिया कि इसके एवज़ में शकूर की बहन यानी मुख्तार माई का बलात्कार किया जाए.
हालांकि बाद में पता चला कि शकूर ने किसी लड़की का बलात्कार नहीं किया बल्कि कबीले के कुछ बड़े लोगों ने उसका शारीरिक शोषण किया था.
बाद में कुछ मानवाधिकार संस्थाओं ने इस मामले को उठाया और मामला अदालत तक गया.
मुख्तार माई को सरकार की तरफ से 9400 डालर का हर्ज़ाना भी मिला जिससे उन्होंने दो स्कूल खोले.