शनिवार, 12 फ़रवरी, 2005 को 13:51 GMT तक के समाचार
पाणिनी आनंद
राघोपुर से
तो क्या हुआ कि राघोपुर से बिहार की मुख्यमंत्री राबड़ी देवी उम्मीदवार हैं, लेकिन हर महिला तो राबड़ी देवी नहीं है. यह कहती हैं अर्चना, जो हाजीपुर क्षेत्र की इस विधानसभा सीट की मतदाता हैं.
अपनी दुर्दशा का रोना रोती और सुधार की बाट जोहती, इस क्षेत्र की हर महिला का भाग्य वाकई राबड़ी देवी जैसा नहीं है पर चिंताजनक तो यह है कि इस क्षेत्र की कई महिलाओं की किस्मत के कोरे कागज पर अब तक सियासत की कलम से कुछ नहीं लिखा गया है.
राघोपुर से राबड़ी देवी प्रत्याशी हैं और इसे लेकर क्षेत्र की कुछ महिलाएँ उत्साहित भी हैं पर यह ख़बर लिखे जाने तक राबड़ी देवी को देखने का भी अवसर क्षेत्र की इन महिलाओं को नहीं मिल सका है और न ही महिलाओं को उनकी ओर से कोई आश्वासन ही मिला है.
ख़ुद उर्मिला देवी कहती हैं, अभी तक तो हमारे यहाँ नहीं आईं पर हम वोट उनको ही देंगे. वो जो भी करेंगी, हमारे भले के लिए ही करेंगी.
जैसा मुखिया कहें
वोट उन्हीं को क्यों, ये पूछने पर वो बताती हैं, घर में सभी उनको ही वोट देंगे, इसीलिए हम भी अपना वोट उनको दे देंगे. यानी उर्मिला देवी के अपने मुद्दे और ज़रूरतें घर के मुखिया के निर्णय पर हावी हैं.
राघोपुर क्षेत्र में केवल एक बालिका विद्यालय है पर लोगों के मुताबिक केवल विद्यालय है, अध्यापिका नहीं, सो लड़कियाँ पढ़ने कहाँ जाएँ.
वैसे बचपन की दहलीज पार करते ही अधिकतर लड़कियों को घर के कामों की शिक्षा देना ही यहाँ ज़्यादा जरूरी समझा जाता है.
राघोपुर क्षेत्र में प्रवेश करते ही हमारी मुलाकात अनीता से हुई. दुबली-पतली अनीता अपने पाँच बच्चों से घिरी हुई थी.
उसके गले में घेंघा रोग के कारण बड़ी सी गाँठ पड़ गई है पर आज तक उसने किसी चिकित्सक को अपनी यह तकलीफ़ नहीं दिखाई. वजह जाननी चाही तो उसने बताया, गाँव में कोई अस्पताल नहीं है, कोई आठ किलोमीटर दूर, फतेहपुर में अस्पताल तो है पर वहाँ जाकर भी दवा नहीं मिलनी है और पटना जाकर इलाज कराने भर के पैसे हमारे पास नहीं हैं.
कैसे बदले सूरत
सबसे बड़ी बात तो यह है कि गाँव में प्रसव के दौरान देखरेख के लिए एक भी नर्स नहीं है और न ही कोई अन्य सुविधा सो प्रसव के दौरान सब कुछ गाँव की दाई और उसके पारंपरिक औजारों से ही होता है.
हाँ, अगर पैसे हों तो पटना जाकर बच्चे को जन्म दिया जा सकता है पर वो अधिकतर महिलाओं के बस से बाहर की बात है. ऐसे में कुछ मामलों में महिलाओं को जानमाल का नुकसान भी उठाना पड़ा है.
वैसे खाना बनाने और घर के बाकी काम करने के लिए रात को इन महिलाओं को लालटेन का ही सहारा लेना पड़ता है. कुछ जगहों पर बिजली के तार हैं पर बिजली नहीं तो कुछ गाँवों में बिजली के खंभे हैं पर तार नहीं.
क्षेत्र में तमाम ईंट-भट्ठों पर काम करती महिलाएँ आसानी से देखी जा सकती हैं. कम मजदूरी में पुरुषों के मुकाबले ये महिलाएँ ज़्यादा काम करती हैं. इनमें से कई तो ऐसी हैं जिनकी उम्र देखकर उन्हें महिला कहने से पहले सोचना पड़ सकता है.
ग़ौरतलब है कि इससे पहले इस विधानसभा सीट से 1995 में लालू प्रसाद यादव ख़ुद विधायक रह चुके हैं पर विकास के नाम पर यह क्षेत्र अनाथ ही दिखता है.
अपनी दुर्दशा के सवालों से लिपटी इस क्षेत्र की महिलाओं को राबड़ी देवी से बहुत आशाएँ तो हैं पर साथ ही आशाओं के पूरे होने पर संदेह भी क्योंकि यही सारे सवाल हर बार चुनाव के दौरान याद तो किए गए पर हल नहीं.