रविवार, 06 फ़रवरी, 2005 को 11:45 GMT तक के समाचार
मणिकांत ठाकुर
बीबीसी संवाददाता, पटना
बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान के बाद सत्ताधारी राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) की चिंताएँ बढ़ गई हैं.
लालू प्रसाद यादव के मुस्लिम-यादव समीकरण में कहीं कहीं आए बिखराव और राज्य की विकासहीनता के ख़िलाफ़ मुखर होते मतदाताओं के कारण यह चिंता उभरी है.
ऐसा लगता है कि मुस्लिम-यादव एकजुटता में बिखराव का एक कारण कांग्रेस और लोकजनशक्ति पार्टी की एकता भी है.
हालांकि विपक्ष प्रचार कर रहा है कि कांग्रेस और लोकजनशक्ति की एकजुटता आख़िरकार लालू प्रसाद यादव की पार्टी की सत्ता को बचाने का तरीक़ा है.
विपक्ष प्रचार कर रहा है कि 15 बरसों के लालू-राबड़ी शासनकाल में अगर दो नारे 'सामाजिक न्याय' और 'साम्प्रदायिकता-विरोध' को हटा दिया जाए तो बचेगा 'अपराध' और 'भ्रष्टाचार'.
चिंता
विपक्ष के इस प्रचार को लोग कितना सुन रहे हैं यह तो अभी पता नहीं लेकिन लालू समर्थकों को अभी भी 'लालूजी के चमत्कार' पर बहुत भरोसा है.
आरजेडी की चिंता इस बात को लेकर बढ़ी है कि बिहार के मुसलमान मतदाता पूछ रहे हैं, "ग़रीबी, बेकारी, ज़हालत, अपराध और घूसखोरी का खौफ़ क्या दंगाइयों से कम हैं?"
यह सवाल वोटों पर किस तरह अपना असर दिखाएगा यह तो पता नहीं लेकिन राजनीति के माहिर खिलाड़ी माने जाने वाले लालू प्रसाद यादव चौकन्ने हो गए हैं.
हालांकि विपक्ष ने इस बार नारा दिया है, "पंद्रह साल बुरा हाल" लेकिन जातीय ध्रुवीकरण वाले राज्य बिहार में विकास का मुद्दा हमेशा गौण साबित होता रहा है.
अपराधी तत्व और रिश्तेदार
इस बीच अपराधी तत्वों की मौजूदगी भी बिहार की राजनीति में तेज़ी से बढ़ी है.
इसी बार के विधानसभा चुनावों में उम्मीदवारों की सूची देखने से समझ आता है कि विधायक बनने की होड़ में इस बार भी अपराधी बहुत आगे हैं.
कई ऐसे अपराधी हैं जिनको राजनीतिक दलों ने सीधा समर्थन तो नहीं दिया लेकिन वे परोक्ष रुप से उनका समर्थन कर रहे हैं.
दूसरी और नेताओं ने अपने रिश्तेदारों को टिकट दिलवाने में कोई संकोच नहीं दिखाया है.
चुनावी टिकटों की ख़रीदी बिक्री के आरोपों के चलते जमकर गाली गलौज और मारपीट हुई है.
पहले चरण के मतदान में जिस तरह की हिंसा हुई है उसने स्वतंत्र और निष्पक्ष मतदान के दावों को खोखला साबित किया है.