बुधवार, 02 फ़रवरी, 2005 को 13:14 GMT तक के समाचार
नेपाल में जहां महाराज ज्ञानेंद्र ने मंत्रिमंडल का गठन कर सत्ता पर पकड़ मज़बूत करनी शुरु कर दी है वहीं माओवादियों ने ज्ञानेंद्र के साथ शांतिवार्ता की संभावना से पूरी तरह इनकार कर दिया है.
नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के प्रवक्ता कृष्ण महरा ने किसी अज्ञात स्थान से फ़ोन के ज़रिए बीबीसी हिंदी सेवा को विशेष इंटरव्यू दिया है.
इस बीच नेपाल नरेश ज्ञानेंद्र ने देश की सत्ता पर अपनी पकड़ मज़बूत करते हुए 10 सदस्यीय मंत्रिमंडल का गठन कर दिया है जिसके अधिकतर सदस्य उनके समर्थक हैं.
महरा ने बीबीसी से कहा कि “महाराजा ज्ञानेंद्र ने नेपाल और नेपाली जनता के ख़िलाफ़ अंतिम युद्ध की घोषणा करके शांतिवार्ता के सभी रास्ते बंद कर दिए हैं.”
हालाँकि अब तक माओवादी कहते रहे हैं कि वो सत्तारूढ़ राजनीतिक पार्टियों से बातचीत करने की बजाए सीधे नेपाल नरेश के साथ बातचीत करेंगे.
कृष्ण महरा ने कहा कि अब नेपाल की सभी राजनीतिक पार्टियों, जनतंत्र समर्थकों और आम नागरिकों को राजशाही के ख़िलाफ़ एक संयुक्त मोर्चे में एकजुट होना चाहिए.
उधर शेरबहादुर देउबा सरकार की बरख़ास्तगी के बाद नेपाल के नागरिकों के सभी अधिकार छीन लिए गए हैं.
अख़बारों और मीडिया पर पूरी तरह सेंसरशिप लगा दी गई है और टेलीफ़ोन और मोबाईल सहित सभी संपर्क सूत्र काट दिए गए हैं.
संयुक्त मोर्चा
माओवादी पार्टी के प्रवक्ता कृष्ण महरा ने बीबीसी हिंदी से कहा कि नेपाल की तमाम राजनीतिक पार्टियों से उनका “औपचारिक और अनौपचारिक संपर्क” बना हुआ है.
उन्होंने कहा, “राजशाही के विरुद्ध सभी ताक़तों को एकजुट होना चाहिए और निरंकुशता के ख़िलाफ़ संयुक्त मोर्चा बनाना चाहिए.”
कृष्ण महरा ने कहा, “अब ये स्पष्ट है कि राजशाही को झुकना पड़ेगा.”
उनसे पूछा गया कि नेपाल नरेश ने अगर माओवादियों पर हमला बोल दिया और भारत सरकार ने उनका समर्थन किया तो माओवादी पार्टी क्या करेगी?
इस सवाल के जवाब में कृष्ण महरा ने कहा, “अगर ऐसा हुआ तो फिर भारतीय लोकतंत्र की बात सिर्फ़ कहावत भर रह जाएगी.”
उन्होंने कहा ऐसी स्थिति में भारतीय जनता भी भारतीय शासकों के ख़िलाफ़ उठ खड़ी होगी और नेपाल की जनता के साथ मिलकर लड़ेगी.
जनतंत्र के मुद्दे पर उनसे पूछा गया कि वो जनतंत्र की बात कैसे कर रहे हैं जबकि उनकी पार्टी बंदूक़ के ज़रिए लड़ाई लड़ रही है?
इस पर कृष्ण महरा ने कहा, “नेपाल में लंबे समय से चले आ रहे निरंकुश सामंती तंत्र को उखाड़ फेंकना ज़रूरी है. इसके बग़ैर लोकतंत्र की बात बेमानी होगी.”
प्रतिक्रिया
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महाराजा ज्ञानेंद्र के क़दम की कड़ी आलोचना हुई है.
नेपाल के तीन महत्वपूर्ण मित्र राष्ट्रों – अमरीका, ब्रिटेन और भारत ने शेर बहादुर देउबा सरकार को बर्ख़ास्त करने के फ़ैसले की भर्त्सना की है.
उधर नेपाल की घटनाओं के कारण बांग्लादेश की राजधानी ढाका में 6 फ़रवरी से शुरू होने वाली दक्षिण एशियाई देशों या सार्क की बैठक अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दी गई है.
भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसमें शामिल न होने का फ़ैसला किया है.
इसी कारण सार्क की अध्यक्षता कर रहे पाकिस्तान ने सम्मेलन रद्द करने का फ़ैसला किया.
अभी उनकी इस घोषणा पर विपक्ष की कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है.
लेकिन माओवादी विद्रोहियों ने नरेश के क़दम के विरोध में बुधवार से तीन दिनों की हड़ताल का आहवान किया है.
राज प्रासाद से जारी एक बयान में उम्मीद व्यक्त की गई है कि नए मंत्रिमंडल को हर तबके का समर्थन मिलेगा.
राजधानी काठमांडू से बीबीसी हिंदी संवाददाता रेहान फ़ज़ल के अनुसार वहाँ जगह-जगह सैनिक तैनात देखे जा सकते हैं. आम लोग मुखर होकर अपनी बात कहने में हिचक रहे हैं.
सैटेलाइट फ़ोन से अपनी रिपोर्ट देते हुए रेहान ने बताया कि वहाँ टेलीफ़ोन लाइनें अब भी ठप पड़ी हुई हैं.
व्यापक आलोचना
इस बीच सरकार बर्ख़ास्तगी के नेपाल नरेश के क़दम की देश और विदेश में व्यापक आलोचना हुई है.
संयुक्त राष्ट्र महासचिव कोफ़ी अन्नान ने नेपाल में लोकतांत्रिक संस्थाओं की तुरंत बहाली की अपील की है.
भारत ने ज्ञानेंद्र के क़दम को वहाँ लोकतंत्र के लिए आघात बताया है.
भारत ने माँग की है कि नेपाल में राजनीतिक नेताओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए और उन्हें संविधान के अधीन मिले राजनीतिक अधिकारों के पालन की अनुमति दी जाए.
अमरीका और ब्रिटेन ने भी नेपाल नरेश की आलोचना की है.
एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यमैन राइट्स वाच ने नेपाल में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की सुरक्षा को लेकर चिंता व्यक्त की है.