विनोद वर्मा, बीबीसी संवाददाता
हरियाणा से लौटकर
हरियाणा में विकास तो हुआ है पर...
इसके आगे खुलकर कुछ कहने वाला शायद आपको हरियाणा राज्य में ऐसा कोई व्यक्ति न मिले जिसका एक तिनका भी दाँव पर हो.
फिर जिनका रोज़गार, व्यापार, जीवन और बहुत कुछ दाँव पर हो वह आमतौर पर कुछ बताने को तैयार नहीं होता ख़ासकर तब जब उसके सामने बीबीसी का माइक लगा हो.
हरियाणा में चुनावी दौरा करते हुए पहले दो दिन तो कुछ समझ में नहीं आया लेकिन सिरसा पहुँचने पर बात धीरे-धीरे समझ में आई.
दरअसल वहाँ भय की एक ऐसी लहर बह रही है जिसने सभी को अपनी चपेट में ले रखा है.
हालांकि भारतीय राष्ट्रीय लोकदल के अधिकांश नेता इसका खंडन करते हैं.
हरियाणा में भारतीय राष्ट्रीय लोकदल के किसान प्रकोष्ठ के अध्यक्ष अवतार सिंह बढाना कहते हैं कि इस तरह की बातें वे ही लोग कर रहे हैं जिनके पास कोई मुद्दे नहीं हैं.
सिरसा चौधरी देवीलाल के परिवार का ज़िला है जिसकी कमान आजकल मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला और उनके दो बेटे अभय चौटाला और अजय चौटाला संभाले हुए हैं.
लोग चौटाला परिवार के कहर को देख सुन चुके हैं और नाम प्रकाशित न करने का आश्वासन मिलने के बाद यह बताते हैं कि वे कुछ भी कहने से इसलिए डरते हैं कि कहीं उनकी भी वही हालत न हो जाए तो दूसरों की हुई.
पूरा राज्य
भय की यह लहर सिरसा में किस तरह छाई हुई है इसका एक उदाहरण बीबीसी टीम को तब देखने को मिला जब वह लोगों की राय लेने की कोशिश कर रही थी.
सिरसा के क्लब में बैठे लोगों से लेकर बाज़ार में दुकानदारों तक एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो अपनी राय खुलकर रखने को तैयार हो.
यदि विपक्षी दल का कोई राजनीतिक कार्यकर्ता न हुआ तो वह चौटाला सरकार का गुणगान करता ही नज़र आया.
एक दुकान पर हमें बताया गया कि काउंटर पर बैठी महिला पेशे से वकील हैं लेकिन जैसे ही उन्होंने हमारा माइक देखा वे अपनी कुर्सी से उठ गईं और अनुरोध किया कि यदि हम अपना माइक अंदर रख लें तो वे चाय भी पिला सकती हैं वरना उन्हें माफ़ करें.
यह माहौल सिर्फ़ सिरसा तक सीमित नहीं था. सिरसा से दड़बा कलाँ विधानसभा क्षेत्र होते हुए हिसार लौटते वक़्त टैक्सी में एक व्यक्ति ने लिफ़्ट मांगी.
गोरखपुर का वह किसान हमारा पत्रकारों वाला परिचय नहीं जानता था सो उसने छूटते ही कहा, "चौटाले तो नहीं जीतते जी. चौटाला और उनके बेटे तो लोगों को धक्का दे रहे हैं."
ठेठ हरियाणवी में उसने जो समझाया उसका मतलब भी वही था जो राज्य के दूसरे हिस्सों में लोगों का कहना था.
दो दिन बाद सिरसा वाला दृश्य दिल्ली के पड़ोस के शहर गुड़गाँव में भी देखने को मिला.
वहाँ ज़िला न्यायालय में चुनाव पर प्रतिक्रिया पूछते ही एक-एक करके कोई दर्जन भर वकील अंतर्ध्यान हो गए.
बड़ी मुश्किल से एक वकील मिले जेएस चौहान जो अपने नाम के साथ कुछ कहने को तैयार थे.
उन्होंने बताया कि किस तरह 'छोटे साहब' ने एक दुकानदार को दुकान बेचकर भागने पर मजबूर कर दिया. 'छोटे साहब' का परिचय पूछने पर उन्होंने बताया कि वे ओमप्रकाश चौटाला के छोटे बेटे अजय चौटाला हैं.
चर्चा
ऐसा नहीं है कि कोई कुछ बोलता ही नहीं बोलते हैं लेकिन वही जिनका दाँव पर कुछ ख़ास नहीं लगा हुआ है. मसलन तीन एकड़ का किसान, रेडिमेड गारमेंट्स का छोटा दुकानदार या फिर वो जो पहले ही अपना बहुत कुछ गँवा चुका है.
आमतौर पर क़ानून व्यवस्था की बात होते ही लोग बिहार का नाम लेते हैं लेकिन देश की राजधानी दिल्ली की ठीक नाक के नीचे के राज्य हरियाणा में क़ानून व्यवस्था की हालत भी कोई कम बुरी दिखाई नहीं देती.
अपने आपको किसान बताने वाले गुड़गाँव के पास के गाँव में रहने वाले एक व्यक्ति ने रिकॉर्डर बंद होते ही बताया कि क्रशर चलाने वालों को सरकार ने किस तरह प्रताड़ित किया है.
यदि उनकी बात मान लें तो हर क्रशर वाले से हर दिन प्रतिदिन अच्छी ख़ासी रकम की वसूली हो रही थी.
सिरसा में एक सज्जन ने बताया कि किस तरह शहर के बीचों बीच की पाँच एकड़ ज़मीन 'प्रभावशाली' लोगों ने 'तोहफ़े' में माँग ली.
फलाँ विधायक के हाथ तोड़ने से लेकर फलाँ वकील और सरकारी अधिकारी की बेदम पिटाई तक ऐसे सैकड़ों क़िस्से हैं जो स्थानीय नागरिक बताने को तैयार हैं बशर्ते आप उनका नाम पता ज़ाहिर न करें.
चौटाला की पार्टी के नेता इन आरोपों का खंडन करते हुए इसे बेसिरपैर की बात कहते हैं लेकिन थोड़ी देर की अनौपचारिक बातचीत के बाद वे मान भी लेते हैं कि अजय चौटाला को ज़रा जल्दी ग़ुस्सा आ जाता है.
विकास के बावजूद
हरियाणा के गाँवों और शहरों में घूमकर एकबारगी किसी को ईर्ष्या हो सकती है कि देश में ऐसा भी एक राज्य है जहाँ विकास की परिभाषा अलग है और ग़रीबी के मायने दूसरे हैं.
एकाएक लगता है कि बिहार, उत्तरप्रदेश और उड़ीसा जैसे राज्यों वाले देश में हरियाणा राज्य इस तरह कैसे हो सकता है.
इस विकास में ओमप्रकाश चौटाला के योगदान का कोई खंडन भी नहीं करता. यहाँ तक के विपक्षी दल कांग्रेस के लोग भी.
लेकिन विकास के बाद भी मुद्दे हैं जिसमें असुरक्षा और भ्रष्टाचार का केंद्रीयकरण सर्वोपरि है, फिर जातिवाद है और 'प्रजातंत्र' के कई सवाल हैं.
ये सवाल इतने तीखे हैं कि साफ़ दिखता है कि राज्य के विकास के बावजूद चौटाला सरकार का दूसरी बार सत्ता में लौटना आसान नहीं है.