सोमवार, 31 जनवरी, 2005 को 14:28 GMT तक के समाचार
हरियाणा में हाँसी एक लाख की आबादी वाला एक क़स्बा है लेकिन यह देश के बड़े सट्टे बाज़ारों में से एक है और यहाँ हर दिन लाखों के वारे न्यारे हो जाते हैं.
और जब समय विधान सभा चुनावों का हो तो मामला करोड़ों तक पहुँच जाता है.
हिसार से 25 किलोमीटर दूर हाँसी में हर उस मुक़ाबले पर सट्टा लगता है जो दिलचस्प हो. फिर चाहे वो विधान सभा के चुनाव हों, लोकसभा के चुनाव हों या फिर महत्वपूर्ण सीटों के मुक़ाबले.
हालाँकि किसी भी प्रकार की सट्टेबाजी कानूनन ग़लत होती है लेकिन यहाँ सब कुछ खुले खेल की तरह नज़र आता है.
जब बीबीसी की टीम हाँसी पहुँची तो हर सदस्य थोड़ा सशंकित था और बहुत सावधानी के बाद एक व्यक्ति से हमारे साथी नागेंदर शर्मा ने पूछा कि सट्टा कहाँ होता है?
पूछना भर था कि देखते ही देखते वहीं ढेर सारे लोग इकट्ठा हो गए वो भी दोपहर दो बजे.
उन्होंने ही हमें सुझाव दिया कि हम शाम को सात बजे के बाद आएँ तो ही सट्टा बाज़ार देख सकते हैं.
सट्टा बाज़ार
रात को जब हम पहुँचे तो भी मन में शंका बनी हुई थी लेकिन वह कु ही देर रही.
सटोरिए भीड़ लगाए खड़े थे और बोलियाँ लगा रहे थे.
सटोरिए बीबीसी से बात करने को भी सहर्ष तैयार हो गए और बाक़ायदा अपने कार्यालय में ले जाकर कई सटोरियों को वहीं इकट्ठा कर लिया.
हमारी साथी सुशीला सिंह ने जब उनसे बातचीत रिकॉर्ड करना शुरु की तो उनमें मानों होड़ लग गई कि कौन पहले बोलेगा.
शर्त बस एक ही कि उनका नाम और फ़ोटो नहीं दिए जाएंगे.
उन्होंने विस्तार से हमें समझाया कि सट्टा कैसे लगाया जाता है और यह भी कि हाँसी के लोग किस तरह मौसम से लेकर क्रिकेट और चुनाव तक, किसी भी बात पर हज़ारों लाखों का सट्टा लगा सकते हैं.
चुनाव
हरियाणा विधानसभा चुनावों को लेकर इस समय हाँसी में करोड़ों का सट्टा लग चुका है.
सबसे ज़्यादा सट्टा लग रहा है दो बातों पर. एक तो यह कि चौटाला कितनी सीटें बचा पा रहे हैं और कांग्रेस कितनी सीटों के साथ सरकार बना रही है.
दूसरा इस बात पर कि रणदीप सिंह सुरजेवाला नरवाणा में कितने वोटों से मुख्यमंत्री चौटाला को हरा रहे हैं. ऐसा ही सट्टा रोड़ी सीट के लिए भी लग रहा है क्योंकि वहाँ से भी चौटाला चुनाव लड़ रहे हैं.
इसके अलावा किसी और सीट पर सट्टा कम ही लग रहा है. सटोरिए बताते हैं कि बाक़ी सीटों पर कोई ऐसा मुक़ाबला नहीं है जिस पर दाँव लगाया जाए. भजनलाल की सीट-आदमपुर पर भी नहीं.
किस तरह काम होता है
सट्टा बाज़ार से जुड़े हुए लोग सभी जगह से रिपोर्ट देते रहते हैं. वे सर्वे करते हैं उसी हिसाब से भाव तय होता है.
वे बताते हैं कि चुनाव मामला तो सिर्फ़ भारत के अंदर ही होता है.
इस सट्टे की कहीं लिखा-पढ़त नहीं होती लेकिन जब फैसला हो जाता है तो भुगतान तुरंत हो जाता है.
लेकिन क्या उन्हें पुलिस नहीं पकड़ती, इस सवाल का जवाब बहुत रोचक मिलता है, "एक-दो बार पुलिस वाले आते हैं और इधर-उधर करके चले जाते हैं अगर सरकार के पक्ष में सट्टा करें तो पुलिस वाले नहीं आते और खिलाफ़ करें तो पुलिस वाले आ धमकते हैं."
हालाँकि सट्टा बाजार राजनीतिक लहर को समझने और परखने का एक पैमाना हो सकता है, लेकिन कई बार इनका पैमाना ग़लत भी साबित हुआ है.
मसलन पिछले लोकसभा चुनाव में.